अब अपना भी परमानेंट अड्रेस है
अब अपना भी परमानेंट अड्रेस है
" बेटा ! याद रखना यह किराए का मकान है इसे ज्यादा गंदा मत करना। नहीं तो जब यह मकान छोड़ने लगेंगे तो मकान मालिक इसके भी पैसे वसूल लेगा !"
पिता की यही हिदायत सुन कर बड़ा हुआ था बेटा। और फिर कहीं बार ग्यारह महीना पूरा होते ही मकान बदलना पड़ जाता तो कई बार मकान की सीली हुई दीवार इसलिए रिपेयर नहीं की जाती, क्योंकि मकान मालिक पैसे नहीं देता था और बाबा उस पर पैसे नहीं खर्च करते थे कि किराए के मकान में क्या खर्च करना..?
कल को तो घर बदलना ही है।यहां तक कि स्कूल में भी कई बार उनकी भद्द उड़ जाती थी जब हर एक साल दो साल बाद उनका एड्रेस चेंज हो जाता था। तब सब उसे चढ़ाते थे कि..." कितने घर बदलते हो यार....और तुम्हारा कितना एड्रेस बदलता है।तुम्हारा कोई परमानेंट एड्रेस नहीं है क्या....? " बहुत चुभता था रमेश को यह सवाल।और ... उससे भी ज्यादा चुभता था कि...जब उसकी मां अपने किराए के मकान में लक्ष्मी पूजा के बाद हाथ की थाप नहीं लगाती बल्कि छोटा सा सिंदूर का टीका लगाकर छोड़ देती थी कि किराए का मकान गंदा हो जाएगा तो मकान मालिक अलग से पैसे वसूलेगा।
किसी मोहल्ले में उसके बाबा मकान लेते तो कुछ दिनों में दोस्ती होती फिर मकान छोड़ना पड़ता तो दोस्तों को भी छोड़ना पड़ता था फिर बार दिल टूटने के बाद दिल जुड़ते इससे भी रमेश बहुत परेशान हो गया था। पौधों को इस जगह से दूसरी जगह लगा लगाओ तो लग जाते हैं, लेकिन पेड़ नहीं लगते।इसी तरह जब रमेश उसके बहन सोना बड़े हो गए तो उन्हें जब बार-बार घर बदलना पड़ता था तो नई जगह उन्हें मन नहीं लगता नहीं किसी से दोस्ती होती थी तो, दोनों बहुत एकाकी और अंतर्मुखी होते जा रहे थे।
छोटा भाई अनु तो और भी चुपचाप रहने लगा था। उसे तो बिल्कुल पसंद नहीं आता था कि वह किराए के मकान में रहे। बड़े बड़े घरों को बड़े हसरत से देखता भैया से कहता कि.." भैया ....क्या कभी हमारा अपना मकान होगा? क्या कभी हमारा परमानेंट एड्रेस होगा? "
सुनकर रमेश अंदर तक दुखी हो जाता था और उसके मन में एक विश्वास दद्दा था और अपने ऊपर और मेहनत करने लग जाता था।बहरहाल.....रमेश , सोना और अनु के माता -पिता रामबाबू और लक्ष्मी पूरी जिंदगी किराए के मकान में रहते आए।अक्सर उन घरों की तख्ती पर मकान मालिक के नाम ही लिखे रहते थे।और .... जब उनके बड़े बेटे रमेश को नौकरी मिली तो उसने जमीन लेकर सुंदर सा बगीचे वाला घर बनवाया,क्योंकि लक्ष्मी को तुलसी में जल डालने का और रामबाबू को बागवानी का शौक था।घर की तख्ती पर उसने अपने माता,पिता दोनों का नाम लिखवाया।
जब गृह प्रवेश हुआ तो उसने घर की चाबी माता-पिता को पकड़ाई तो दोनों बहुत भावुक हो गए और बोले,"आज हमें घर मिला है,हमें तुम पर गर्व है बेटा !"
मामा घर की दीवारों पर अपने हाथों के हल्दी लगे छाप लगाने लगी तो छूट छोटी बहन सोना तो खुश होकर पूरे घर में घूमने लगी और यह देखकर बहुत खुश हो गई कि उस घर में उसके लिए भी एक कमरा अलग से बना था। अनु उचलकर बोला कि....
"अब हमारा भी परमानेंट एड्रेस हो गया भैया !"
उन चेहरों की चमक में रमेश अपने आप को बहुत भाग्यशाली समझ रहा था। (समाप्त )
