रिपुदमन झा "पिनाकी"

Horror


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रिपुदमन झा "पिनाकी"

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आत्मा का वास

आत्मा का वास

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     वीणा अपने पति और दो बच्चों पिंकू छः साल और गुड्डू तीन साल के संग कुछ दिन पहले ही उस घर में आई थी। तीन कमरों, किचन, बाथरूम, हॉल और बरामदे वाला बड़ा दो तल्ला मकान था। दूसरे तल्ले पर एक परिवार रहता था जिसमें शांति नाम की एक महिला थी। लेकिन वो कहीं गये हुए थे हालांकि बातचीत उससे भी उतनी नहीं होती थी। शांति का मायका नज़दीक ही था इसलिए उसकी मां अक्सर शांति के पास चली आती थी। इसी क्रम में वीणा की एक दो बार शांति की मां से बातचीत हुई थी। हालांकि मोहल्ले में नई थी सो किसी से अभी उतनी जान-पहचान भी नहीं हुई थी। शाम का समय गर्मी का मौसम। वीणा आंगन से सटे दरवाजे के पास रात का भोजन पका रही थी। एक तरफ कोयले के चूल्हे पर रोटी पकाती वीणा और उधर दूसरी तरफ उसके दोनों बेटे शाम की पूजा आरती करते। कि तभी एक बिल्ली की बड़ी भयंकर सी आवाज़ वीणा के कानों में पड़ी। आंगन से होते हुए दरवाजे के पास आकर खड़ा हो गया। बिल्ली में हर चीज डरावनी थी। जैसी उसकी डरावनी आंखें थी वैसी ही भयानक गर्जन वाली आवाज़। जो सुने उसका दिल दहल जाए। हालांकि साधारण बिल्ली समझ कर उसे भगा दिया। खाना पकाकर बच्चों को पढ़ाने बैठ गई तभी आंगन से सटे गली के तरफ़ दरवाजे पर दस्तक हुई।साथ ही शांति.. शांति की आवाज भी आई दो तीन बार दस्तक और आवाज के बाद वीणा उठ कर देखने गई शायद उपर रहने वाले आए होंगे। दरवाजा खोल कर देखा तो कोई भी नहीं था। शायद भ्रम होगा ये सोच कर वीणा दरवाजा बंद कर कमरे में आ गई और अपने बच्चों को पढ़ाने लगी। कुछ देर बाद उसके पति अनिरुद्ध भी काम से लौटे तो वीणा ने सारी बात बताई जो अभी हुई थी। अनिरुद्ध ने भी भ्रम बताकर बात समाप्त कर दी। फिर सबने खाना खाया और सो गए। आधी रात में छत पर तारकोल से भरा ड्रम घड़कने की आवाज़ से अनिरुद्ध और वीणा की नींद खुल गई। इतनी रात में कौन छत पर ड्रम खिसका रहा है जबकि उपर कोई भी नहीं है। उनके लिए ये नया अनुभव था। गड़ गड़ की आवाज से दिल दहल उठा था। वीणा ने शाम को आई बिल्ली की बात अनिरुद्ध को बताई। अनिरुद्ध वीणा को शांत करता रहा। वीणा दोनों बच्चों को बाहों में समेटे हनुमान चालीसा का पाठ करती रही। रात आंखों में ही कट गई। सुबह उपर रहने वाले लोग आ गए। वीणा ने उन्हें रात की सारी घटना बताई कि शायद आपकी मां आई थी। दरवाजा खटखटाया, आपका नाम पुकारा। जब मैंने दरवाजा खोला तो कोई भी नहीं था। और रात को बड़ी भयंकर सी आवाज़ आ रही थी जैसे कोई भारी-भरकम सामान इधर-उधर खिसका रहा हो।

    शान्ति ने तब सारी बातें सुनकर कुछ सोच कर कहा - भाभी यहां एक आत्मा का वास है। मकानमालिक की बहू की अकाल मृत्यु हुई थी इसलिए उसकी आत्मा भटकती है। मुझे भी रात को ऐसी आवाजें सुनाई देती हैं। जब आप सब नहीं थे तो मुझे भी आवाज आती थी। वो जो बिल्ली है वो वही आत्मा है।उस पर कभी भी वार मत कीजिएगा।वो हमले से गुस्सा कर कोई अनिष्ट भी कर सकती है। वीणा बहुत डर गई। अनिरुद्ध से मकान खाली कर कहीं और चलने को कहा लेकिन अनिरुद्ध ने इतनी जल्दी कोई दूसरा मकान कहां मिलेगा कहकर बात टाल दी। ऐसे ही कुछ दिन बीत गए। वीणा डर-डर कर रहती थी। एक दिन वीणा का भाई उदयन आया। नौकरी की तलाश में आया था तो बहन के पास रहने लगा। उसके सामने भी वही सब हुआ जो प्रतिदिन होता था। रोज़ की तरह जैसे ही शाम को बिल्ली भयंकर गर्जना करते हुए आई उदयन ने चिमटा फेंक कर उसे मारा तो बिल्ली भाग गई। सुबह जब नहाने के लिए उदयन बाथरूम में घुसा तो बाथरूम में सूख रहे कपड़े उसे ख़ून से लथपथ मिले। सभी के मन में दहशत और बढ़ गई। अनिरुद्ध भी अब सोचने लगा। वीणा का मन किसी अनहोनी को सोचकर सशंकित होने लगा। दिन भर डर और उधेड़बुन में गुज़र गया। शाम को बिल्ली फिर उससे भी अधिक गर्जना करते हुए आई जैसे कल के घटना से बहुत अधिक क्रोधित हो। अड़ोस-पड़ोस वाले भी तरह तरह की बातें करते।

    एक दिन उदयन एक मौलवी साहब को घर लेकर आया। उसने देखते ही कहा - यहां एक बहुत ही ख़तरनाक साया है। ये बदले की फ़िराक में है। किसी के साथ भी कोई भी हादसा हो सकता है। उसने तंत्र-मंत्र से सब ठीक करने की बात कही। सभी के राज़ी होते ही उस मौलवी ने अपना अनुष्ठान शुरू किया और घर को मंत्र शक्ति से बांध दिया। कुछ दिन सब शांत रहा। तब तक वीणा अनिरुद्ध को एक और पुत्र हुआ। उदयन की नौकरी लग गई। एक दिन रसोईघर में रखा खाने का बर्तन गिरने की आवाज़ आई वीणा ने जाकर देखा तो सामने वही बिल्ली। रोटी बिखरा हुआ। वीणा का दिल गुस्से और डर से ज़ोर से धड़कने लगा। उसने आव देखा न ताव उसपर बेलन दे मारा। मियाऊं करती हुई बिल्ली चली गई। रात को सब खाना पीना खाकर सो गए। आधी रात को पहले से कई गुना भयंकर गर्जना करते हुए वो दोबारा कमरे में दाखिल हो गई जहां सब सोए थे। फिर औरत की आवाज में कहने लगी तुमने मुझे चोट पहुंचाई है इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। दूसरे ही दिन वीणा के तीसरे बेटे की तबीयत ख़राब हो गई। उल्टी-दस्त बुखार हो गया। डॉक्टर से इलाज करवाया तो ठीक हो गया। सबने उसे भ्रम जानकर भुला दिया। लेकिन एक रात अचानक वीणा नींद से उठी तो देखा कि छोटे बेटे का मुंह खुला हुआ है और जीभ उल्टी हुई है और आंखें बंद हैं। शरीर में कोई हरकत नहीं है। घर में रोना-धोना शुरू हो गया। वीणा का छोटा बेटा अब इस दुनिया में नहीं था। उस बिल्ली ने अपना बदला ले लिया था। अपनी संतान खोकर कुछ दिन बाद मकान खाली कर दूसरी जगह चले गए।


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