Sheela Sharma

Inspirational


4.5  

Sheela Sharma

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आशाओं की उड़ान

आशाओं की उड़ान

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दरवाजे पर रूकी ऑडी कार ने मेरा ध्यान बरबस अपनी तरफ खींच लिया। इस गाड़ी में कौन आया होगा?तभी व्हीलचेयर के साथ एक सुंदर छरहरी स्त्री द्वारा डवरु को सहारा देकर उतारते देख, मैं आश्चर्य से भर उठी। दूर से उसने वही सम्मोहित हंसी बिखेरते हुए मुझे हाथ जोड़कर "प्रणाम बीबीजी"ःःकहा। क्या ःःःये शख्स वही अपना छोटा सा बातूनी ,लकड़ी के सहारे लंगडा़ कर चलने वाला डब्ब् है जो घर-घर जाकर रद्दी लेता था।

वह अपनी आदतों से इतना लाचार था सड़क पर पड़ी छोटी-मोटी चीजों को उठा कर बोरी में भर लेता था। "" डब्ब् तुम सड़क पर पड़ी चीजों को हाथ मत लगाया करो मुझे अच्छा नहीं लगता" मैं अपनी नाराजगी जाहिर करती।।""क्या करूं बीवी जी यही सब तो अपने संगी- साथी हैं रोजी -रोटी है ""वह हंसकर हमें चुप करा देता। उसका व्यवहार ,अदब कायदा देखकर हमारा उसकी तरफ खिंचाव इंतजार करवाता ,उसे रद्दी देने के लिए।

उसका दिमाग कंप्यूटर जैसा काम करता।छोटी सी छोटी वस्तु देख भर ले उसकी कीमत बताने के साथ-साथ,उससे कितनी सारी और चीजें बनाई जा सकती हैं यह बताते वह थकता ही नही था। कई बार अपने बारे में भी बताता हुआ अतीत में खो जाता फिर आंखों में आंसू भर कर अपनी ही ःरौ ःमें कह उठता ""बीबीजी आप मेरी बातें कैसे सुन लेते हो।लोग तो मेरी खिल्ली उड़ाते, औकात बताते हैं।चाल तो आड़ी टेढ़ी है लंगड़ा कहीं का पर अपने आपको न्यूटन की औलाद समझता है""। मुझे मोहल्ले के बच्चे ही नहीं बड़े तक चिढ़ाते हैं।अब मुझे कुछ करना होगा बड़ा बनना होगा। क्या मैं कुछ बन पाऊंगा बीबीजी ?

मेरे सर पर अपना हाथ रखकर आशीर्वाद दे दो और मेरा हाथ पकड़ कर खुद ही अपने सर पर रख लेता। इस हरकत को देख मेरी हंसी छूट पड़ती।डबरू के विषाद भरे चेहरे पर भी मुस्कुराहट छा जाती। उसकी मीठी जादुई बातों से मेरा मन ही नहीं भरता मैं उसे प्यार से डब्बू कहने लगी थी।

उसे पैसे से प्रेम अकारण नहीं हुआ था । इसके पीछे उसके अतीत की, रोजमर्रा की घटनायें थी।

 वह समझ चुका था। इस मायावी धन लोलुप संसार में सभी की नजरों में अपनी अहमियत बनाए रखने के लिए चांदी की खनक जरूरी है।धीरे-धीरे उसके आने की अवधि बढ़ती गई। पता नहीं बिना बताए वह कहां चला गया ?हमने कुछ दिनों तक उसका इंतजार भी किया। दिन महीने साल बीतने लगे थे

पहाड़ी गांव की झोपड़ी में रहने वाले डबरू के जन्म लेते ही घर में ढोल बजने के बजाएं ,उसकी विकलांगता देख आंसुओं की झड़ी लग गई।

 बाबा ने बड़ी कोशिश की ऐसे बच्चे को तो नदी में बहा आयें ,जंगल में फेंक दें कम से कम जानवरों का पेट तो भरेगा।घर मे रखकर जिंदगी भर दुख तो नहीं झेलना पडे़गा। पर मां ःःःकी ममता ? 

 रोज रोज की कलह का अंत बाबा ने दूसरी शादी करके घर छोड़कर की। भूख की आग ने मां की ममता को क्रूरता में बदल दिया था डब्व् पर दुश्वारियों का पहाड़ टूट पड़ा।

 खेलने खाने की उम्र में वह तड़के उठकर घर का काम करता और एक गिलास काली चाय पी कर भेड़ चराने निकल पड़ता।कभी कभार मां सिदौरी बांधती, वरना ज्यादातर पेट पर कपड़ा बांधे ,पानी पीकर दिन निकाल लेता था 

उसके अकेलेपन का साथी था पहाड़ी सुंदरता ,प्रकृति जो सर्दी छोड़कर हर मौसम में हमेशा उसका साथ देती।बारिश में तो कहने ही क्या दादर की टरटर, पपीहा की पीहू पीहू, झींगुर की चिक मिक, नदी नाले का कलकल बहता पानी उसे अच्छा लगता था। थोड़ी दूर बहती झील उसे अपनी तरफ खींचती थी। झील में नाव और नाव पर सवार बैठे लोग हंसते गाते ,अच्छे-अच्छे कपड़े पहने ,उसे अपने पास बुलाते से लगते थे। वह ललचाई नजरों से घंटों तक उन नजारों को देखता रहता "क्या मैं तुम्हारे साथ बैठ सकती हूं ""किसी ने कंधे पर हाथ रख कर पतली क्षीण आवाज में कहा इतनी बारिश में यहां कौन आ सकता है ?पलटते ही आश्चर्य से उसका मुंह खुला का खुला रह गया। चीथड़ों में लिपटा, झांकता सफेद संगमरमर शरीर, बेतरतीब बाल ,बड़ी-बड़ी निस्तेज धंसी आंखें, रेशमी अधर हिल रहे थे। उसे समझ ही नहीं आ रहा था सपना है या हकीकत।फिर आवाज आई "मैं तुम्हारे साथ खेलूं"? क्यों नहीं आओ " दोनों मिलकर खेलने लगे।

बचपन ने यौवन का रूप ले लिया था।सुबह से शाम तक वे अपने अरमानों की दुनिया में खोए रहते।कभी झील के पानी में पैर लटकाकर तो कभी,एक दूसरे पर पानी के छींटे उछाल कर।

 अब डबरू को लगने लगा था जैसे जिंदगी के रंग विरंगे रंग ,उसके रग-रग में समा कर, कड़वाहट को दूर कर, अपने आंचल में छुपा रही है। प्यार की पींगे भी वक्त के साथ बढ़ती जा रही थी।पर इश्क और मुश्क छुपाए नहीं छुपता।गांव वालों को पता चल चुका था वे लोग कोई कदम उठाते। इससे पहले एक रात दोनों अपना गांव छोड़कर यहाँ आ गए थे।

 महीने ,साल ,रेलवे स्टेशन ,बस स्टैंड, फुटपाथ पर बंजारा डेरा डाले दरदर घूमते रहे।कहीं भी जीविका का साधन और रहने का ठौर ठिकाना नहीं बन पाता। किसी दिन मिट्टी -गारे की मजदूरी मिल जाती ,तो थोड़े बहुत पैसे मिलते ही, दोनों सपने की दुनिया में विचरण करने लगते ।

थोड़े थोड़े पैसे जोड़ कर उसने रद्दी खरीदनी बेचनी शुरू की।चोकन्नी निगाहें सड़क पर दौड़ती रहती शायद कहीं कुछ और मिल जाए, पर लोगों को लगता कि वह चोरी के इरादे से उनके घर की तरफ ताक झांक कर रहा है। 

उन सभी की असहनीय ,इल्जामियत निगाहें तीर की तरह हमेशा उसे चुभती रहती। आखिर हार थक कर उसने यह शहर ही छोड़ दिया था।

 जगह बदली थी पर डबरु ने हिम्मत नहीं हारी। बरसों की पिछड़ी कड़ी अब मेरे सामने खुल रही थी। कैसे वह रद्दी के साथ टूटाफूटा बेकार सामान भी लेने लगा उन्हें रगड़ चमका कर बाजार में बेचता और ज्यादा कीमत पाता था 

 उसने कभी किसी से सुना था कि चंडीगढ़ का रॉक गार्डन बेकार की चीजें से बना हुआ अनमोल कलाकारी का नमूना है।

 बस फिर क्या था उससे प्रेरित होकर वह अपनी प्रतिभा को निखारने में जी जान से जुट गया। रद्दी कागजों को गला कर ,कूटकर हाथ से तरह-तरह की कलाकृति बनाकर बेचने लगा। अनोखी चीज की चाहत किसको नहीं होती।उसकी मेहनत रंग लाने लगी थी

धीरे-धीरे लोहा ,कांच पीतल,रंगीन पत्थर के टुकड़ों को शेप मे काटकर ,पिघला कर ,सांचे में डालकर तराशने लगा। नायाब वस्तुएं की मांग बढ़ने लगी।

उसने पहले फुटपाथ, फुटपाथ से दुकान ,दुकान से शोरूम खोला।हस्तनिर्मित शिल्प कला की मांग बढ़ती चली गई।बीबीजी आप के आशीर्वाद से आपके डब्बू को जीवन में इज्जत ,यश शोहरत सब कुछ मिल रहा था। हम बहुत खुश थे, पर होनी को कौन टाल सकता है।।  

अचानक कारखाने में आग लग गई , सब भीषण लपटों में समा गया।भागदौड़ करते वक्त मेरी कमर पर भारी लोहे की रॉड गिरने से रीढ की हड्डी टूट कर चूरचूर हो गई। चार-पांच महीने के बाद अब कहीं जाने आने के लायक हुआ हूँ।खैर आप फिकर मत करो। मैं नहीं चल पाऊँगा तो क्या हुआ ?मेरी प्रेरणा मेरा हमसफर, आपकी बहूःः तो मेरे साथ है, आप की दुआएं हमारे साथ है और हमें क्या चाहिए?

मेरे कम्पित स्वर अभी निकले भी नहीं थे।क्लांत चेहरा देखकर वह बोल पड़ा"" आप ठीक तो है बीवीजीःः उदास मत होइए।जीवन में धूप छांव तो चलती ही रहती है रात की कालिमां के बाद सूर्य की किरण रोशनी देगी ही""

हमेशा की तरह उसके चेहरे की रौनक ,उसकी स्वप्निल आंखों की चमक उसकी दृढ़ता ,कर्मठता विश्वास को उजागर कर विकलांगता को अनदेखा करते हुये, फिर नए उड़ान की तैयारी कर रही थी।


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