Sneha Dhanodkar

Inspirational


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Sneha Dhanodkar

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आपा.. एक माँ ऐसी भी

आपा.. एक माँ ऐसी भी

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सिया अपनी मीठी सी आवाज़ मे चिल्लाती हुई आयी "आपा आपा कल क्या बनाएंगे।मुझे तो पिज़्ज़ा खाना है"।साकेत ने उसे देखा और कहां। "हां मेरा बच्चा कल कल पिज़्ज़ा पक्का।चलो अब किचन मे देखते है, पिज़्ज़ा का सामान है या नहीं। नहीं तो हमें जाकर लाना पड़ेगा ना"सिया बोली "ओके आपा।"

सिया मात्र साढ़े चार साल की है। उसकी माँ उसे जन्म देने के दूसरे दिन ही चल बसी थी। उसे उसके पापा दादी दादा और बुआ ही संभालते है। साकेत और रिया की ये पहली ही बेटी है। रिया जन्म देने के बाद ठीक हो गयी थी। सब इतने खुश थे। सबसे ज्यादा खुश साकेत और रिया ही थे क्युकि वो लड़की ही चाहते थे। दोनों ने प्यार से उसका नाम सिया रखा।

घर मे भीं सबने दोनों के लिये पूरा घर सजा कर रखा था। पुरे घर को गुलाबी बना दिया था। डॉक्टर ने भीं तीन दिन बाद छुट्टी का बोल दिया था। बच्चा और जच्चा दोनों स्वस्थ थे। साकेत ने रिया के लिये एक डाइमंड का मंगलसूत्र भीं सरप्राइज देने के लिये ला रखा था। वो बहुत ज्यादा खुश था। अब तक रिया ने उसकी हर ख्वाहिश पूरी की थी।

अगले दिन सुबह अचानक रिया को खांसी आयी और कोई और कुछ समझ पाता इससे पहले रिया, साकेत और दुधमुंही बच्ची को छोड़ हमेशा के लिये इस दुनिया से चली गयी।

साकेत के पैरो के नीचे से जैसे जमीन और सर से आसमान दोनों गायब हो गए थे। उसे समझ नहीं आ रहा था वो क्या करे। वो कभी सिया को तो कभी रिया को देख रहा था। उसकी आँखों मे आंसू ही नहीं थे बल्कि सिया की चिंता भीं थी। वो छोटी सी बच्ची जिसे ये भीं नहीं पता था की उसकी माँ चली गयी है उसे छोड़कर हमेशा के लिये। बुआ की गोद मे आराम से सोई थी।

साकेत रुंधे गले से इतना ही कह पाया ये "तुमने अच्छा नहीं किया रिया। मुझे क्यूँ छोड़कर चली गयी"। और बस चुपचाप बैठे बैठे उसे देखता रहा। ज़ब तक नर्स ने उसके चेहरे को सफ़ेद चादर से पूरा ढक ना दिया।

साकेत के दिमाग़ ने काम करना बंद कर दिया था उसने सोचा भीं नहीं था जो मंगलसूत्र वो रिया को सरप्राइज देने के लिये लाया था उसे उसकी अंतिम यात्रा मे पहनाना पड़ेगा। कल तक जो घर पूरा गुलाबी सजा हुआ था आज आसुओ से सरोबार हो गया था। सारी विधियां संपन्न होने के बाद भीं साकेत अभी तक सदमे मे ही था।

दो दिन बाद जब सिया रात को बहुत रोने लगी तो साकेत जो वैसे भी जग ही रहा था उसे लेकर घर मे घूमने लगा। दीदी और माँ भीं उठ गए थे। साकेत से सिया को उन्होंने लेना चाहा पर उसने मना कर दिया। सिया भी थोड़ी देर मे चुप हो गयी थी। साकेत को वो टुकुर टुकुर देख रही थी। मानो कह रही हो आज से आप ही मेरी माँ हो। साकेत ने रिया की तस्वीर की और देखा और रिया से कहां। आज से तुम्हारी इस अमानत की पूरी जिम्मेदारी मेरी। मै आज से इसकी अम्मा और पापा दोनों। याने मै इसका आपा।

साकेत का अपना व्यापार था, तो उसने पापा से कह दिया की अब वो ऑफिस नहीं जायेगा आप सब देख ले। अब वो घर पर ही रहेगा सिया की आपा बनकर। साकेत ने एक माँ की तरह अपनी बच्ची का ख्याल रखा। बस दूध ही वो बोतल से पिलाता था। बाकी तो पूरे चौबीस घंटे वो अपनी बिटिया के साथ ही बीतता था।

सिया छह महीने की हो गयी थी। साकेत के घर वाले सिया और साकेत दोनों को लेकर चिंतित थे। उन्होंने साकेत से कहां दूसरी शादी कर ले ताकि सिया को एक माँ मिल जाये और उसे जीवन संगिनी।

साकेत ने साफ मना कर दिया। उसने कह दिया की सिया की माँ और पापा दोनों वही है। और उसकी जिंदगी मे रिया की जगह कोई नहीं ले सकता।  पुरे दो साल साकेत ने घर मे सिया की माँ बनकर गुजारे।उसके खाने का ध्यान। उसके वैक्सीन। उसकी दवाई। उसकी हर हरकत को साकेत समझता था। कभी उसे कहानी सुनाता। कभी उसके साथ घोड़ा घोड़ा खेलता। कभी उसके साथ मस्ती करता कभी उसे प्यार करता। उसे नहलाने से लेकर रात को सुलाने तक का सब जिम्मेदारियां साकेत ने एक माँ की ही भांति निभाई।

दो साल बाद जब सिया को स्कूल मे डाला तब साकेत ने ऑफिस जाना शुरू किया वो भीं सिर्फ दो घंटे के लिये।  वो सिया को स्कूल छोड़ता वही से ऑफिस जाता और आते समय उसे ले कर घर आ जाता।

सिया के स्कूल का जितना समय होता साकेत उतने ही समय के लिये ऑफिस जाता था। बाकी उसे जब समय मिलता घर से काम कर लेता था  सिया भीं अपने आपा के पास ही ज्यादा रहती थी। साकेत उसकी हर जरूरी चीज का ध्यान रखता था।  सिया को क्या चाहिये और क्या नहीं ये वो एक माँ की ही तरह समझने लगा था।

सिया बड़ी हो गयी थी। जब वह थोड़ा समझने लगी, तो स्कूल मे जब दूसरे बच्चों को उनकी माँ छोड़ने आती तो सिया भीं अक्सर पूछती थी की मेरी माँ कहां है। तो एक बार साकेत ने उसे बैठ कर सब अच्छे से समझाया। रिया की तस्वीर दिखाई और उसे बताया की उसकी माँ उसे छोड़कर बहुत दूर चली गयी है जो वापस नहीं आ सकती इसीलिए वो ही उसकी माँ है और वो ही उसका पिता भीं। उसका आपा।

सिया के लिये इस उम्र मे सब समझना शायद बहुत मुश्किल था। पर साकेत फिर भीं पूरी कोशिश करता था की उसे सब समझा सके और माँ की कमी पूरी कर सके।  इसीलिए साकेत ने पूरी रसोई भी सीख ली थी। हालांकि खाना बनाना तो माँ ने पहले से ही अपने दोनों बच्चों को सिखाया था। पर अब वो हर तरह का खाना बनाने मे भीं पारंगत हो गया था।

वैसे तो घर मे माँ और दीदी थी सबकुछ बनाने के लिये पर वो चाहता था की सिया को कभी ये ना लगे की उसकी माँ उसके लिये कुछ नया और विशेष नहीं बनातीं। इसीलिए वो सब सिख गया था। और कल सिया को उसका फेवरेट पिज़्ज़ा बना कर खिलाने की तैयारी कर रहा था।

बड़ी होने पर सिया अब समझने लगी थी की उसकी माँ कहां गयी और साकेत ने उसके लिये क्या कुछ नहीं किया। वैसे भीं कहते है लड़कियां बहुत जल्दी बड़ी हो जाती हैं। अब साकेत और सिया दोनों मिलकर एक दूसरे का ध्यान रखते थे। आँखों आँखों मे दोनों की बाते हो जाती थी। दोनों का आपसी तालमेल बहुत ज्यादा था।  दोनों एक दूसरे की बाते बिना कहे समझ जाते थे। बिल्कुल जैसे एक माँ और बेटी।


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