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हरि शंकर गोयल

Tragedy Inspirational


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हरि शंकर गोयल

Tragedy Inspirational


आई बरखा बहार

आई बरखा बहार

11 mins 310 11 mins 310

आज सावन का महीना लग गया था । अच्युत को सावन के महीने से कुछ विशेष लगाव था । कारण ? एक तो आसमां पर सदैव मेघ छाये रहते हैं सावन में । ये मेघ चाहे बरसात लायें या नहीं लेकिन छांव तो करते ही हैं । इससे तापमान कम हो जाता है और गर्मी से राहत भी मिल जाती है । इसके अलावा आसमां में मेघों की अलग-अलग आकृतियां दिखाईं देती हैं । कभी मेघ घोड़े बन जाते हैं तो कभी बाज । कभी आदम और हव्वा बनकर प्रेमलीला करते हैं तो कभी छोटे छोटे बच्चों के जैसे पकड़म पकड़ाई खेलते हैं । वह बहुत देर तक इन बादलों को देखता रहता है और जिस प्रकार बच्चों की अठखेलियां देखकर उनके मम्मी-पापा खुश होते हैं , ऐसे ही इन बादलों की चालबाजियां देखकर अच्युत प्रसन्न होता है । 

जब कभी ये बादल अपनी झोली का सारा पानी रिमझिम रिमझिम फुहारों के रूप में धरती पर उड़ेलते हैं तब उसे इन फुहारों में भीगना कितना मधुर लगता है । वह घंटों इन फुहारों में बैठे रहना पसंद करता है । उसे ऐसा लगता है कि जैसे वह प्रकृति मां की गोदी में बैठा है और प्रकृति मां उसे अपनी गोदी में बैठाकर उस पर प्रेम वर्षा कर रही हो और वह उस प्रेम वर्षा में आकंठ डूबा हुआ हो । 


इस सीजन की पहली बरसात हो रही थी आज । हालांकि पहले भी एक दो रोज बरसात हुई थी लेकिन बहुत थोड़ी सी हुई थी । मतलब सब्जी में "छोंक" के बराबर । वो भी कोई बरसात थी क्या ? "छींटें" कहते हैं हमारे यहां पर इनको । इन "छींटों" से गर्मी और ऊमस और बढ़ जाती हैं । तब यही इच्छा होती है कि बरसात हो तो "जोरदार" हो अन्यथा नहीं हो । 


आज भगवान ने अच्युत की पुकार सुन ली शायद । सुबह तो खुला खुला दिन था । मगर दस बजते बजते ऐसा मौसम पलटा कि घुप अंधेरा हो गया । सारे घर की लाइटें जलानी पड़ी । फिर टूट कर बरसात हुई । लॉन के सामने बरामदे में कुर्सी डालकर अच्युत बैठ गया और बरसात का आनंद लेने लगा । 


उधर लॉन में पेड़ पौधों का "रेन डांस" हो रहा था । बरसात की सुर-ताल पर समस्त पेड़ पौधे , लताएं और फूल भाव विभोर होकर नृत्य कर रहे थे । अच्युत से भला कैसे सहन होता ? एक देसी कहावत है कि "पाड़ोसन खावै दही , मोसे कब जाये सही" । पेड़ पौधों को नृत्य करते देखकर अच्युत भी लॉन में कूद पड़ा और "ताल से ताल मिला" की तर्ज पर वह भी "रेन डांस" करने लगा । 


अच्युत की मम्मी उससे बार बार कह रही थी कि बेटा अब बस कर । ज्यादा भीगेगा तो बीमार पड़ जायेगा । लेकिन बरसात में कूदे हुए बच्चे ऐसी भैंस की तरह होते हैं जो एक बार तालाब में घुस जाये तो घंटों बाहर निकलने का नाम ना ले । बेचारा भैंसवाला बाहर से ही उस पर चिल्लाता रहता है और गालियां निकालता रहता है । मगर भैंस तभी बाहर निकलती है जब उसका मन भर जाये पानी से । अच्युत की मां बरामदे में बैठी बैठी उसे अंदर आ जाने के लिए कह रही थी । मगर अच्युत कहां सुन रहा था मम्मी की । 


अभी दोनों मां बेटे लड़ झगड़ ही रहे थे कि एक खुली जीप घर के बाहर आकर रुकी । उसमें अच्युत के दोस्त समीर , कन्हैया , अलंकार और हर्ष बैठे हुए बरसात का आनंद ले रहे थे । जीप के ऊपर की छत हटा दी गई थी । चारों दोस्त "रेन सफारी" का आनंद ले रहे थे । उन्होंने वहीं से अच्युत को आवाज दी 


"ओए कमीने , आ रहा है क्या तू ? चल , 'रेन सफारी करेंगे । आमेर तक चलते हैं" । 


अच्युत का नाम इस मंडली ने "कमीना" रखा हुआ था । मंडली में नामकरण सर्वसम्मति या बहुमत से होता था । समीर का नाम "इडियट" तो कन्हैया "चोट्टा" अलंकार का "पप्पू" और हर्ष का नाम "चमचा" रखा हुआ था । पूरी मित्र मंडली इन्हीं नामों से बुलाती थी आपस में । अगर किसी ने असल नाम ले दिया तो पैनल्टी लग जाती थी उस पर । 


कमीने शब्द सुनते ही अच्युत समझ गया कि "बारात" आ गई है । उसने मम्मी से कहा "मम्मी, मैं जाऊं" ? 

"इतनी बरसात में कहां जाना है बेटा ? देखते नहीं कितनी तेज बरसात हो रही है ? नहीं , मैं नहीं जाने दूंगी तुम्हें" । मम्मी ने चिंता जताते हुए मना कर दिया । 


इतने में सारे दोस्त बाहर लॉन में आ गए और अच्युत की मम्मी से हाथ जोड़कर रिक्वेस्ट करने लगे । अच्युत ने आव देखा ना ताव , सीधा दण्डवत लेट गया मम्मी के चरणों में । मम्मियों की बड़ी मुसीबत हो जाती है । वात्सल्य के कारण मना नहीं कर सकतीं लेकिन चिंता के कारण जाने भी नहीं देना चाहती । क्या करें क्या ना करें ? तब इस मंडली का नेता "इडियट" सामने आया और घुटनों पर बैठकर हाथ जोड़कर बोला 

"आपकी चिंता जायज है आंटी जी । मेरी मम्मी ने भी ऐसे ही चिंता जताई थी । मगर आप ये तो सोचिए आंटी जी कि हम कोई दूध पीते बच्चे तो नहीं हैं ना । आखिर कॉलेज के विद्यार्थी हैं हम लोग । अपना भला बुरा सब जानते हैं । फिर हम अकेले तो नहीं हैं ना । पूरे पांच हैं । पांच पांडव । और आप यह भी जानते हैं कि पांच पांडवो ने सैकड़ों कौरवों को परास्त कर दिया था । इसलिए आप चिंता ना करें । अच्युत रूपी अर्जुन के लिए मैं कृष्ण बन जाऊंगा । बस, आप इसे जाने की अनुमति दे दीजिए" । 


मां का दिल बहुत कोमल होता है । बड़ी जल्दी पिघल जाता है। अच्युत की मम्मी का भी दिल पिघल गया और जाने की अनुमति दे दी । चारों दोस्तों ने खुशी के मारे अच्युत को अधर उठा लिया और नाचने लग गये । 


टोली "रेन सफारी" पर चल दी । गाड़ी में भीगते , डांस करते, मस्ती करते हुए जा रहे थे वे पांचों । बरसात के गानों की अंत्याक्षरी चलने लगी । उनके पिटारे से एक से बढ़कर एक गीत निकल रहे थे । 


बरखा रानी जरा जमके बरसो ।

मेरा दिलबर जा ना पाए झूम कर बरसो ।‌‌ 


सावन का महीना पवन करे सोर । 

जियरा रे झूमे ऐसे जैसे बन मा नाचे मोर ।। 


तुम्हें गीतों में ढालूंगा , तुम्हें गीतों में ढालूंगा

सावन को आने दो, सावन को आने दो ।। 


अरे हाय हाय ये मजबूरी, ये मौसम और ये दूरी 

मुझे पल पल है तड़पाए , 

तेरी दो टकियां दी नौकरी में मेरा लाखों का सावन जाये । 


टिप टिप बरसा पानी , पानी ने आग लगाई 

आग लगी पानी में तो दिल को तेरी याद आई 

तेरी याद आई तो जल उठा ये भीगा बदन

आज बस में नहीं मेरा मन तू ही बता क्या करूं ?


दिल में आग लगाए , सावन का महीना 

नहीं जीना नहीं जीना तेरे बिन नहीं जीना।। 


इस तरह सुहाने सफर का लुत्फ लेते हुए चले जा रहे थे वे लोग । रास्ते में एक भुट्टे वाला मिल गया । एक शेड के नीचे ठेले पर भुट्टे सेंक रहा था । पांचों ने पांच भुट्टे सिकवाये और भुट्टों का आनंद लेते हुए "रेन सफारी" का मजा लेते हुए फिर से चल पड़े । 


आमेर में बरसात और ज्यादा थी । वहां पर लोगों का रेला लगा हुआ था । लोग भूल गए थे कि अभी कोरोना गया नहीं है मगर शायद यह "तीन चार महीने घर में कैद" रहने का परिणाम था कि लोग सीजन की पहली बरसात का "फेस्टिवल' मनाने शहर से बाहर निकल पड़े थे । 


इन सैलानियों में युवा लड़कियां भी खूब सारी थीं । लड़कों की आंखें ऐसी होती हैं कि वे अंधेरे में भी लड़कियों को खोज ही लेती हैं । आठ दस लड़कियों का एक ग्रुप भी आया हुआ था वहां पर । सभी लड़कियां कुछ ज्यादा ही मॉडर्न लग रहीं थीं । नेकर और टॉप पहने हुए थीं सभी । टॉप भी स्लीवलैस और डीप गले वाला । उन आधुनिक लड़कियों को देख देखकर इन पांचों के दिलों में भरी बरसात में भी आग लगने लगी थीं । जिस तरह बरसात को देखकर फूल कलियां खिल उठती हैं , उसी तरह लड़कियों को देखकर लड़कों का दिल भी धक धक करने लग जाता है । मन मयूर नृत्य करने लगता है और फिर शुरू हो जाती है छेड़छाड़ । 


ये "पंच रत्न" भी "बहारों" के मजे लेने लग गये । वे लड़कियां जहां जहां घूमने जाती उनके पीछे-पीछे ये भी चलते जाते । लड़कियों को लेकर छेड़खानी भी कर रहे थे आपस में मगर लड़कियों को प्रत्यक्षतः कुछ नहीं कह रहे थे । उन लड़कियों को भी इस छेड़खानी में आनंद आने लगा था । लड़कियां भी चाहतीं हैं कि कोई उनकी सुंदरता की तारीफें करे । कुछ छेड़खानी करे । ये रोमियो जब जब भी लड़कियों को देखते तो हल्के से मुस्कुरा भी देते थे । और वे लड़कियां भी इनको देखकर मुस्कुरा देती थीं । इस तरह एक साथ कई मोर्चों पर काम हो रहा था । बरसात का आनंद , ऐतिहासिक महल का भ्रमण और आंखों के माध्यम से प्यार का निवेदन । सब एक साथ । सभी को बड़ा आनंद आ रहा था । 


वो लड़कियां वहां पर बनी एक वॉच टॉवर पर जाने लगी । ये भाई लोग भी उनके पीछे पीछे चलने लगे । आधा रास्ता पार कर लिया था उन्होंने । अब बरसात भी थम गई थी । फुल मस्ती चल रही थी कि अचानक अच्युत का मोबाइल बज उठा । अच्युत ने देखा कि मम्मी का फोन है । मम्मी कहने लगी कि "बस, बहुत हो गया बरसात का आनंद । न्यूज़ चैनलों पर बहुत सारे हादसे बता रहे हैं । अब मुझे डर लगने लगा है इसलिए तुम सब अब घर पर आ जाओ बस । अब मैं और कुछ सुनना पसंद नहीं करूंगी" ।


अच्युत ने अपने दोस्तों का खूब हवाला दिया मगर इस बार मम्मी पूरी तरह से दृढ़ संकल्प थीं । इसलिए उसने अपनी सौगंध देकर उन्हें लौटने पर मजबूर कर दिया। 


इतने में बड़े-बड़े काले काले बादल तेज तेज दौड़ने लगे । फिर से अंधकार छा गया। पांचों पांडव बुझे मन से लौट रहे थे । उधर वॉच टॉवर पर वो आधुनिक दिखने वाली लड़कियां पहुंच गई थीं और आनंद अतिरेक में जोर जोर से चिल्ला रहीं थीं । ये लोग नीचे खड़े होकर उनकी मस्ती देखने रुक गये थे । 


इतने में आसमां में एक जोरदार बिजली चमकी और कडकी । उस बिजली की रोशनी में वह वॉच टॉवर और उस वॉच टॉवर पर खड़े सभी लोग उस दूधिया रोशनी में नहा गये । बिजली के तेज प्रकाश से सबकी आंखें चौंधिया गई थी । बादलों के टकराने की जोर की आवाज आई और एक जोर की चीख सुनाई दी । इन पांचों को भी एक झटका सा लगा और ये पांचों लड़के नीचे जमीन पर गिर पड़े । 


वॉच टॉवर पर चीख पुकार मची हुई थी । वॉच टॉवर पर बिजली पड़ी थी इससे वॉच टॉवर टूट गई थी और गिर पड़ी थी । वॉच टॉवर काली पड़ गई थी । वहां पर मौजूद बहुत सारे लोग मर गए थे । कुछ लोग पत्थरों के नीचे दबे पड़े थे और जोर जोर से चिल्ल। रहे थे "बचाओ , बचाओ" ।


वे पांचों लोग एकदम से खड़े हो गए और अपने जीवित होने के लिए भगवान और अच्युत की मम्मी का धन्यवाद करने लगे । अभी थोड़ी देर पहले अच्युत की मम्मी सभी दोस्तों को "ललिता पंवार" लग रही थी वही अच्युत की मम्मी अब साक्षात माता "पार्वती" लगने लगीं । पांचों दोस्तों ने तय कर लिया था कि अब वे वॉच टॉवर में फंसे उन सभी पीड़ित लोगों की मदद करेंगे । अच्युत ने अपनी मां को फोन कर इस घटना की जानकारी दी और पीड़ित लोगों की मदद करने की अनुमति मांगी । मां ने बहुत सोच विचार करने के बाद अनुमति दे दी और अब वे सब उन सैलानियों की मदद करने चल पड़े । 


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