2050 का जीवन
2050 का जीवन
कैसी होगी 2050 की दुनिया, अभी 2023 में यह सवाल बेहद उत्सुकता जगाता हुआ लग रहा है कि 2050 में दुनिया कैसी होगी?
पाठकगण हमारा जन्म 50 के दशक के अंत में हुआ और हमने केवल दशक ही नहीं अपितु शताब्दी भी बदलती हुई देखी लेकिन फर्क क्या पड़ा? सब कल की सी ही बात लगती है। जहां 23 साल आपको बहुत लगते हैं हमें थोड़ा सा समय ही लगता है। फिर भी जानने की इच्छा जग आई है तो हम भी अपनी कल्पना के घोड़े दौड़ाते हैं ।
नई नई मशीनों और आविष्कारों के कारण यूं लगता है मानव भी मशीनी युग में एक मशीन की तरह हो गया है। प्रकृति से कोसों दूर, दिखावटी। कंप्यूटर युग में प्रवेश करने के बाद तो वह स्वयमेव ही कंप्यूटर में परिवर्तित होता जा रहा है।
शारीरिक श्रम करने की जरूरत ना रही तो शारीरिक शक्ति का स्वयमेव ही ह्वास हो रहा है। बड़े-बड़े जंगल कट रहे हैं पर्यावरण और जल समाप्ति की ओर है। विकास की गति यही रही तो धीरे-धीरे मानव संसार में कहीं पर भी पहुंचने में सक्षम होगा लेकिन आध्यात्मिक शक्ति का पतन होने के कारण जीवन में मूल्यों का स्थान नगण्य हो जाएगा।
अब भी जब हम देखते हैं की 60 -70 के दशक के बड़े-बड़े शहतूत नीम,बड़, पीपल जामुन के पेड़ों की जगह छोटे-छोटे से दिखावटी वृक्ष लगाकर यह साबित किया जा रहा है पर्यावरण की रक्षा हो रही है। आज के लोग वह छोटे छोटे पेड़ देखकर हरियाली समझ कर खुश हो जाते हैं।
अब जब पेड़ ही वही दिखते हैं तो कोई कैसे यकीन कर सकता है कि सड़कों पर पहले बड़े-बड़े से पेड़ हुआ करते थे। शारीरिक श्रम का कम प्रयोग करके केवल बुद्धि के ही प्रयोग से मानव थकान महसूस करेगा।
रिश्तो में भी बहुत से रिश्ते तो खो ही चुके होंगे। चाचा ताऊ मौसी ,मामी ,बुआ इत्यादि रिश्ते कहां दिखेंगे। मूल्यों का पतन हुआ एकल परिवार का चलन हुआ। आगे दुखद स्थिति यह आएगी कि एकल परिवार में भी परिवार की जरूरत ही खत्म हो जाएगी।
संपूर्ण जानकारियों से भरे हुए गूगल और व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी से भी ऊपर कोई यूनिवर्सिटी होगी जिससे पढ़ कर पढ़े-लिखे लोग जानकारी से भरपूर और भावनाओं से शून्य होंगे। यदि परमात्मा ने 100 वर्ष से ऊपर की उम्र दी तो शायद हम इस धरती पर होंगे अन्यथा नहीं।
लेकिन शायद अपने विचार लिखने की परिस्थिति में तो नहीं होंगे।
वैसे भी हम जैसे भावना एवं कर्तव्य प्रधान लोगों का कंप्यूटर युग में ना तो कोई स्थान है और ना ही कोई जरूरत। हां इतना जरूर है कि आज समाज के तौर-तरीकों में, रीति-रिवाजों में और टेक्निकल प्रयोगों में जो हम लोग स्वयं को टेक्निकली चैलेंज्ड महसूस करते हैं, उस समय की टेक्नोलॉजी में हमारे यही बच्चे शायद हमारी आज की मनोदशा को समझ सके।
बहुत अधिक जानकारी और अत्यधिक साधन यकीनन उस समय के लोगों की मानसिक शांति तो भंग करेंगे ही इसलिए हो सकता है कि उस युग में लोग फिर से पीछे देखते हुए अध्यात्म का सहारा लेना चाहें।
बाकि पाठकगण मैं तो यही कहना चाहूंगी हमने जीवन के छह दशक के ऊपर यूं ही गुजार दिए और ऐसा लगता है कल की बात है तो यह दो दशक भी कोई बहुत ज्यादा समय तो नहीं लेंगे बीतने में, आपका क्या ख्याल है ?
