STORYMIRROR

Alok Singh

Abstract

3  

Alok Singh

Abstract

ज़िंदगी

ज़िंदगी

1 min
264

कुछ चवन्नी अठन्नी सी मुस्कुराहटें लिए

वो दिल बहलाता है कई खजाने लिए

एक गम हो तो वो सहम जाए

गुनगुनाता है वो कई  तराने लिए

बात कैसी भी हो ऐसी तो नहीं होती है

खुश सभी को रखे ऐसी बोली नहीं होती है

अकेला भी है घूमता किसी की तलाश में

महफ़िलों में भी अब वो हंसी टटोली नहीं होती है

कुछ नमकीन कुछ कडुई समस्याएँ लिए

वो मुस्कुराता है कई फ़साने लिए

एक दिन हो तो वो मर जाए भी

जीता है वो हर गम उठाने के लिए

कुछ चवन्नी अठन्नी सी मुस्कुराहटें लिए

वो दिल बहलाता है कई खजाने लिए



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract