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Prafulla Kumar Tripathi

Abstract

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Prafulla Kumar Tripathi

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ज़िंदगी का दंश !

ज़िंदगी का दंश !

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अब सहा जाता नहीं है

ज़िंदगी का दंश

काश पंछी की तरह से

अपने भी होते पंख


कभी तन की कभी मन की

आग बढ़ती है बदन की

पूर्णता में ढूँढ़ता हूँ

ज़िन्दगी के अंश


पा के खोया कि खो के पाया

दूर जाती अपनी छाया

आह जीवनवाह जीवन

क्यों बदलते रंग


धूप आगे पाँव पीछे

नदी आगे नांव पीछे

और देखो यह नदी क्यों

हो चली बदरंग।


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