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अधिवक्ता संजीव रामपाल मिश्रा

Tragedy

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अधिवक्ता संजीव रामपाल मिश्रा

Tragedy

यह गम की खेती कोई खाद नहीं..

यह गम की खेती कोई खाद नहीं..

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मुझे बचपन से ही गम मिला है जिंदगी में,

एक दोस्त ने सभाला मुझे हर पल हर घड़ी में..

जाति एक हमारा धर्म एक दोनों का,

फिर भी साथ नहीं गम अपनों का.

..

दोस्त भी दोस्त एक ईश्वर का रूप होता है,

ज़ब सच्ची प्रीत कृष्ण सुदामा जहाँ होता है..


साथ साथ एक सार पढ़े हम,

बचपन जवानी साथ रहे हम..

कभी वासना का खेल न खेला,

कभी नहीं अश्लील हुए न बोला,

एक मजबूत रिश्ता था और है,

जैसे राधा का कृष्ण सलोना..


वो आज दूर है मजबूर है,

रिश्तों का प्यार मजबूत है

मगर अफ़सोस मुझे नहीं,

ख्याल पूंछता मासूम है..


न दिल पर लेता हूँ

न दिमाग़ पर लेता हूँ

बस प्यार का एहसास समझो,

कोई खेल गमों का खेलता हूँ..


तन्हाई तन्हा क़लम कागज का मिलन होता,

कोई गम मेरा कोई नज्म मेरी दास्तां रोता..

मैं शायरी कर लेता हूँ

ऐसा आप सोचते हो

कोई गम या प्यार है

नहीं शौक कर लेता हूँ..


धड़कन कोई प्यार की नहीं सांस लेता हूँ ,

यह गम की खेती कोई खाद नहीं लेता हूँ ..


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