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Ganesh Chandra kestwal

Inspirational

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Ganesh Chandra kestwal

Inspirational

वो

वो

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प्रीति करती रोज न्यारी।

प्यार की वो मूर्ति प्यारी।।

प्रेम से है बात करती। 

बात से वो मिष्ट भरती।।१।।


किंकिणी को वो बजाती।

चाप पद की भी सुनाती।

नाद कानों में पड़ें जब।

भाव लाखों हैं जगे तब।।२।।


बाण नैनो से चलाती।

घाव दिल पे है लगाती।।

पास धीरे लौट आती।

जख्म की पीड़ा मिटाती।।३।।


नाग जैसे केश उसके।

गाल पर हैं लोल लपके।।

फूल जैसे होठ प्यारे।

हैं समेटे सोम सारे।।४।।


चाल में है मौज मस्ती।

जो सभी के चित्त हरती।।

दंत पाँती है सुहाती।

प्यार से जब मुस्कराती।।५।।


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