वो सत्रह थे
वो सत्रह थे
ना मरे नहीं मैं कहता हूं जिंदा हैं वो जानों में
इसके दिल में उसके दिल में अपनों में अनजानों में
माटी में उनको मिलना इसलिए मूंद ली अपनी आंखें
सारी गोली झेल ली खोल अपनी बाहें
बंदूकें तो दिखावटी थीं
गाथा तो थी शौर्य की
जो पढ़ी सुनी है तुमने मैंने
मराठों की कभी मौर्य की
वो समझे वो जीत गए मार माटी के पूतों को
माटी में मिलने का सुख कौन समझाए उन कपूतों को
लिपटा तीन रंग में तन उनका जो बात बड़े है शान की
छुपने से मरना अच्छा आखिर बात थी अभिमान की
तुमने उनको मारा क्योंकि तुम्हारी कौम के लिए वो खतरा थे
वो सत्रह थे वो सत्रह थे
- प्रतीक
