ज़िंदगी
ज़िंदगी
जाते जाते क्यों मुस्कुरा रही है जिंदगी
फिर से कर रुआ सा रही है जिंदगी
एक उम्र से महज़ उम्र ही तो कट रही है
खुद उम्र से कर दगा रही है जिंदगी
लोरी सुना सुना कर सुला देती हैं आरज़ू
डर दिखा दिखा कर जगा रही है जिंदगी
हर वक्त रख हौंसला है क्या मुझे मिला
जब हाथ की लकीर सुलगा रही है जिंदगी
वो पूछते हैं ख्वाब क्या है तेरा काफ़िर
बाजुओं की गोद में जगमगा रही हो जिंदगी
कि खुल्द की खबर बस तुझको ही है प्रतीक
सो कलमा तेरी नजर में गा रही है जिंदगी
- प्रतीक
