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Prateek Jain

Others

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Prateek Jain

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किसी को

किसी को

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किसी को छत कम पड़ी मांझा समेटने को
किसी ने सारे शहर में पतंग उड़ाई हैं 
किसी को कम पड़े रंग फुलझडियों के
किसी ने बीन बीन मोमबत्तियां जलाईं हैं

किसी को ज्यादा नमक से रंज
किसी की भूख जीवन पर तंज
किसी को लपेट दिया रुई के गलियारों में
किसी ने मवेशियों संग गर्मी पाई है

किसी को किसी की सोहबत से बैर
किसी के झूमते नंगे पैर
किसी को गुड्डे गुड़िया भी कम
किसी ने पत्थरों से यारी निभाई है

किसी के सपनों में भी राहतें 
किसी की जिंदगी में भी ज़िल्लतें
किसी ने एक कंकड़ उस ओर फेंका
किसी के शामियाने पर आफत बन आई है

किसी को उजाला और रब मिला
किसी को अंधियारे का सबब मिला
पालने में थे दो नसीब
किसी को बाहों में तारे मिले
किसी ने तारो की बाहों में ज़िन्दगी बिताई है


- प्रतीक


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