वो नाम हूँ..
वो नाम हूँ..
दो बूँद आँसुओं के खारे पन से
समुद्र भी हारा होगा
जब नवेलियों ने माँग का सिंदूर पोंछ
मंगलसूत्र उतारा होगा
तो क्या हुआ
गए थे ...लंबे चौड़े गोरे चिट्टे कद काठी में.
लौटे एक माँस का टुकड़ा...कटोरे में आया होगा
एक फौजी की सुहागन होने का गौरव उसके दिल ने नहीं
पूरी दुनिया ने उस को गौरवान्वित हो बताया होगा
मर मिटी थी वह भारत के उस इंकलाब के नारे पर
खुश हुई ..कितनी थी वह जब.
शहीद सुहाग पर उसके चिलमन- ए- दुनिया ने
आगे बढ़कर जिंदाबाद का नारा लगाया होगा
बुजदिली में जो रोए उनकी आँखों में वह पानी था
कायर ना थी वीरांगना यह
आँखों ने इसकी पवित्र गंगाजल गिराया होगा
क्योंकि वह कह कर गया था
मैं फौजी उस सरहद का प्रहरी हूँ
गोलियाँ सीने पर खाने का व्रत आहारी हूँ
धूप, बरसात, तूफान ...हो चाहे पूस की ठंडी रात
रेत चल जाए चाहे आँखों में.. पलकें ना झपकेगी
नियमित जागता भारत माँ का...मैं वो चौकीदार हूँ
ज़मींदोज कर दूँ... दुश्मन के कदम की आहट को
मुकम्मल वो... मैं रोशन -ए- काफिर हूँ.
तो क्या हुआ.. दुर्गम है रास्ता किंचित मुझ में भी डर नहीं
गद्दार तो क्या ...उसका साया भी ना फटक पाएगा
हर जर्रे जर्रे चप्पे-चप्पे पर रखने वाली... मैं वो नजर हूँ
आऊँगा जब लिपट कर ..तिरंगे में मत रोना तुम
मैं मरकर भी अमर रहूँगा.. तुम्हारे आसपास रहूँगा
मुस्कुराता फौजी माँ भारती का वो लाल हूँ
शहीदों में चमकता सुनहरा.. मैं वो नाम हूँ
