विषाद
विषाद
गीत
सुख सागर की लिये हिलोरें ,
बहुधा मन इतराता है !
दुख की बदली अगर छा गई ,
तब उदास हो जाता है !!
है विषाद , अवसाद कहो जी ,
दे गरीब को मार सदा !
वह करता संघर्ष बड़ा ही ,
नहीं मानता हार कदा !
स्वप्न टूटते रोज बिखरते ,
वह भी बिखरा जाता है !!
दुख थोड़ा पर भारी लगता ,
दिन मानो ज्यों बरस हुए !
पोर पोर में दर्द परोसे ,
रोम रोम को लगे छूए !
मिले घाव जो रिसते रहते ,
मनुज कराहे जाता है !!
सुख पाहुन सा आता जाता ,
इंतज़ार सबको रहता !
तन मन सारे खिले खिले से ,
मदिर पवन सा है बहता !
दशा बदलती , भाव बदलते ,
समय बदल सा जाता है !!
जीवन सागर जैसा गहरा ,
सुख दुख की लहरें आती !
वायु वेग सी समय गति दे ,
है प्रतीति मन छू जाती !
कर्मों का फल सबके हिस्से ,
करनी से बँट जाता है !!
