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शायर देव मेहरानियां

Tragedy

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शायर देव मेहरानियां

Tragedy

विश्वकर्मा बन दीन हीन

विश्वकर्मा बन दीन हीन

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विश्वकर्मा बन दीन हीन,अनजान राह पर भटक रहा।

भुजबल और कौशल से गगनचुंबी इमारतें की थी खड़ी।

छोटे से हसीं आशियाने पर,नियति की थी नजर बुुरी पड़ीं।।

विश्वकर्मा घर से हो, बेघर अनजान राह पर भटक रहा।

हर दर्द उसे कितना तड़फाये,अब तो इसकी लग गई झड़ी।


विश्वकर्मा बन दीन हीन,अनजान राह पर भटक रहा।

भूख प्यास से व्याकुल हो ,'कुएँ में मौत' के लटक रहा।।


ना किया था कोई सैर सपाटा,कभी तजा ना हिन्दुस्तां प्यारा।

घर पर ही जैसे मौत आ गई,भटके फिरता मारा मारा।।

पासपोर्ट ने डंक है मारा, जहर उसका ही है गटक रहा।

विश्वकर्मा बन दीन हीन,अनजान राह पर भटक रहा।।


छोड चला वो हसीं आशियाँ, बरसों से जिसे सजाया था।

चित्कार उठी घर की दीवारें, देहरी ने अश्क बहाया था।।

लगे किसी ने पकड़ लिया हाथ ,अब बाहों को है झटक रहा।

विश्वकर्मा बन दीन हीन,अनजान राह पर भटक रहा।।


धन दौलत की नहीं आरजू, जीवन आराम से कट जाये।

रहूँ पास मैं बस अपनो के, दर्द दिलों का बँट जाये।।

थोड़ा सा चैन सुकून भी उसका, ना जाने क्यों खटक रहा।

विश्वकर्मा बन दीन हीन,अनजान राह पर भटक रहा।।


नन्हे-नन्हे बच्चों को ले,अनजान सफर पे निकल पड़ा।

कैसे अब वो घर पहुंचेगा , मिलों का है डगर पड़ा।।

क्यों छोड रहा है नगर पुराना, इसी भाव से जकड़ रहा

विश्वकर्मा बन दीन हीन,अनजान राह पर भटक रहा।


विश्वकर्मा बन दीन हीन,अनजान राह पर भटक रहा।

भूख प्यास से व्याकुल हो 'कुएँ में मौत' के लटक रहा।।


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