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अंजनी कुमार शर्मा 'अंकित'

Abstract

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अंजनी कुमार शर्मा 'अंकित'

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"विनती"

"विनती"

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हे प्रभु! हुई थी क्या हमसे,

इतनी भयानक बड़ी भूल।

खुशियों की सुंदर बगिया में,

बिछा दिए काँटों के फूल।

एक साथ विश्व की यह जनता,

करती है विनती बार-बार।

कि बंद करो ये प्रलय प्रभु,

सारी दुनिया अब गयी हार।

जन मानस की पुकार सुनों,

हे! बल बुध्दि के नागर,

फैला दो सुख की ज्योति प्रभु,

हे दीनबंधु! करुणा सागर।


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