विकास गाथा----------------
विकास गाथा----------------
एक गांव में किसान के पास कुछ विदेशी आये उन्होंने उस किसान को पूछा "तुम इतनी मेहनत कर के क्या कमा लेते हो ? न तुम्हारे मकान सही हे न सड़के l कितनी गरीबी में तुम अपना जीवन व्यतीत कर रहे हो ,
हम तुम्हे विकसित कर देंगे तुम्हारे घर तुम्हारी सड़के तुम्हारा रहनसहन सभी बदल जायेगा बस तुम ऐशो आराम की जिंदगी व्यतीत करोगे"
किसान ने कहा "कैसे ?"
विदेशी "तुमको कुछ नही करना है बस जैसा हम कहे वैसा करते जाओ सबसे पहले ये जो तुम बीज बोते हो यह ज्यादा पैदावार नही कर सकते पहले तुम इसे बदलो किसान न बात मन ली और उनके बीज बोना शुरू कर दिए शुरुआत तो ठीक रही परन्तु कुछ सालों बाद फसल पहले से कम हो गई और लगातार कम होती गई l"
किसान ने फिर उनसे पूछा "अब क्या करे?"
फिर उन्होंने उसे खेत में दवा छिड़कने का उपाय बताया कुछ समय बाद फिर वही स्थिति फिर उसमें दवा के साथ रासायनिक खाद भी डाली गई l
अब फसल तो ठीक हो गई पर किसान की सेहत खराब रहने लगी अब किसान खेतो के अलावा स्वयं के लिए भी दवा लेने लगा वह कमजोर होने लगा उससे अब खेती का मेहनती काम नही हो पा रहा था अब उसे उन्होंने ट्रेक्टर भी दिला दिया और पंचायतो को लोन देकर सड़के भी बनवा दी बस उन्होंने उस पर टोल लेना शुरू कर दिया अब किसान कर्जे में रहने लगा उसे फसल की कीमत में मुनाफा भी लागत की अपेक्षा कम मिलने लगा अब किसान कर्ज तो दूर कर्ज का ब्याज भी नहीं चुका पा रहा था।
फिर विदेशी आये बोले "अब तू किसानी छोड़ यह तेरे बस की नही तू अपनी जमीन हमे दे दे हम तुझे अच्छा पैसा देंगे और तेरा कर्ज भी चुक जायेगा!"
किसान फिर खुश हुआ l
उसने जमीन बेचीं और शहर में आकर एक फ्लैट और गाड़ी खरीद ली कुछ साल पैसा चला फिर वही कर्ज का दौर! धीरे धीरे उसका फ्लेट भी बिक गया और गाड़ी भी l अब वह वापस अपने गांव आया तो उसकी बेचीं जमीन पर फैक्ट्री खड़ी थी अब वह उसी फैक्ट्री में मजदूरी कर रहा है और उसी फैक्ट्री के मॉल से सामान खरीद रहा है बचा पैसा वह अस्पताल में खर्चकर रहा हे
उसके बच्चे भी अच्छी पढ़ाई कर बेरोजगार घूम रहे हे उनके भी सर पर एजुकेशन लोन चढ़ा हुआ है वह भी कर्ज भरने के लिए कर्जदार होते जा रहे है ऐसा है विकास का तिलिस्म न घर के रहे न घाट के l
