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Vandana Gupta

Romance

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Vandana Gupta

Romance

विदा करो मुझे

विदा करो मुझे

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किस शून्य में

छिप गए हो

कहाँ कहाँ ढूंढूं

किस अंतस को चीरूँ

जब से गए हो मुहँ मोड़कर

प्रीत की हर रीत तोड़कर

किस पथ को निहारूं मैं

कैसे बाट जोहारूं मैं


तुम तो मुख मोड़ गए

मुझे अकेला छोड़ गए

अंखियन ने बहना छोड़ दिया है

ह्रदय का स्पंदन रुक गया है

तुम्हारे वियोग में प्रीतम

अंतस मेरा सूख चुका है


वो तेरा रूठ कर जाना

फिर बुलाने पर भी ना आना

जीवन को ग्रहण लगा गया है

कैसे भीगी सदायें भेजूं

किन हवाओं से पैगाम भेजूं

कैसे ख़त पर तेरा नाम लिखूं

लहू भी सूख चुका है अब तो


निष्क्रिय तन है अब तो

सिर्फ़ साँसों की डोर है बाकी

विदाई की अन्तिम बेला है

और आस की डोर कहीं बंधी है

तुम्हारे मिलन को तरस रही है


तेरे दीदार की खातिर

ज़िन्दगी मौत से लड़ रही है

हर आती जाती साँस के साथ

अधरों पर

तेरे नाम की माला जप रही है

निश्चेतन तन में कहीं

कोई चेतना बची नही है

इक श्वास ही कहीं

अटकी पड़ी हैतेरे विरह में कहीं

भटक रही है


अब तो आ जा

अब तो आ जा

मुझे एक बार फिर से

अपना बना जा

मेरी विदाई को

मेरा इंतज़ार न बना

शायद यही सज़ा है मेरी


आह ! नहीं आओगे

लो चलती हूँ अब

विदा करो मुझे

मेरे इंतज़ार के साथ

आस भी टूट गई

रूह भी पथरा गई

और साँस थम गई।


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