वैतरणी पार कराती निर्मला हूँ
वैतरणी पार कराती निर्मला हूँ
शक्ति से बनी हुई और मेहनत से कसी हुई बला हूँ
अपना अस्तित्व तलाश्ती हुई मानिनी उज़्ज़वला हूँ !
आंतक से आतंकित नहीं,बल्कि धधकती ज्वाला हूं
घनघोर तिमीर को मात सी देती हुई मैं चंद्रकला हूँ !
ना किसी ऋषि की शापित मैं कोई निरीह अबला हूँ
आदर्श पुरुष की प्रतीक्षा में अहिल्या जैसी शिला हूँ !
पापियों के कर्मों भूल वैतरणी पार कराती निर्मला हूँ
मैं स्वयं कीचड़ में खिली एक पंकज़ा, श्वेत धवला हूँ !
कभी तो बेहद संजीदा तो कभी मैं बेहद चंचला हूँ
सबके समक्ष गर्व से कहती हूँ, हाँ, मैं एक महिला हूँ !
