STORYMIRROR

Damyanti Bhatt

Abstract

4  

Damyanti Bhatt

Abstract

Untitled

Untitled

1 min
568

जब भी

पग डग मग हों मेरे

थाम लेना मुझे अपने अधरों की बंसी सा

जब जब जग ने मुझको ठुकराया

मैंने खुद को बढ़ कर पाया


उधार की करुणा

खरीदे रिश्ते

संवेदनहीन लोग


प्रेम देह की वर्जनाओं से मुक्त

एक गीत है

आत्मा के स्रोत की एक बूंद

जो आतप्त रूह को

शीतल करती


देह तो एक पड़ाव है 

इस पर ठहरे लोग

नहीं पा सकते प्रेम


जब प्रेम स्पर्श करता है

देह विलुप्त होती है


जब प्रेम हो जाता है

तब अतिरिक्त सब शून्य हो जाता


जब सब शून्य हो जाता

तब प्रेम उत्सव मनाता


कोई नहीं जान सका था

सच को

कैसे पिया था मीरा ने विष को

वो पुकार रही थी गिरधर को


मेरे घुंघरू के स्वर

समाहित हों श्याम चरणों मैं


हम दो नहीं एक हो जायें

सदा के लिए


जग ने तेरे मंदिर बनाये

में तेरे संग घर बसाऊं

विरह की तो कथायें सुनी थी

जब तक मेरे भाव पहुंचते तेरे दर तक

मेरी प्रार्थना का शव जलाया जा चुका था



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract