उड़ान
उड़ान
उड़ान -
जब पंखो को फैलाने की सीख ली थी कला-
आहिस्ता आहिस्ता पार कर गया बंधनों का किला-
अब मैं था, मेरी ख्वाहिशें थी-
जिंदगी की राह में राह रोके खड़ी कितनी ही आजमाइशें थीं-
कुछ को भेद कर, कुछ अभेद छोड़ कर-
संतुष्टि की तलाश में चल दिया बहुतों से मुंह मोड़ कर-
कुछ और, कुछ और पाने की अभिलाषाओं ने
धरा से आकाश की ओर खींचा था ऐसा-
शांत समुद्र में अचानक उठता तरंगो दबाव होता है जैसा-
कितनी कश्तियों को डूबते देखा और कितनों को डुबोता गया-
स्वार्थ और लालच की बरसात से खुद को भिंगोता गया-
बस मैं था, मेरी आकांक्षायें थीं-
अर्जुन की मत्स्य भेदन सी इच्छायें थी-
जो पाने के लिए मैं भागा था सोते जगते-
बहुत मुस्कराया इस जग खो ठग के-
आज जब दौड़ते जिंदगी की रेस मे थक सा गया हूं-
ऐसा लगा सोते सोते जग सा गया हूं-
पर पीछे मुड़ कर देखा आज मैं अकेला था-
कल तक मुझे घेरे भीड़ थी, लोग थे, एक मेला था-
शायद! मैं, उस सूखे कुएं सा हो गया हूं जो पाट दिया जाता है-
जिंदगी के मरुस्थल में खड़ा बवूल का पेड़ हूं जिससे दामन फटने के डर से काट दिया जाता है-
यही है जिन्दगी का एक सिलसिला-
जब पंखो को फैलाने की सीख ली थी कला-
आहिस्ता आहिस्ता पार कर गया बंधनों का किला-
राजीव रावत
