तू क्या है मृत्यु?
तू क्या है मृत्यु?
विज्ञान कहता है,
तू श्वास का थमना है,
हृदय का अंतिम स्पंदन है,
न्यूरॉन्स के तार का टूट जाना है तू।
कहलाती है पहले तो क्लीनिकल मृत्यु, फिर जैविक विघटन,
जैसे परखनली में बुझता कोई प्रयोग हो।
उधर दर्शन फुसफुसाता है,
तू तो जीवन के पार का पुल है,
कहीं मोक्ष है, कहीं पुनर्जन्म, स्वर्ग-नरक का द्वार भी...
शरीर की चेतना, आत्मा का चोले से बाहर आना है मृत्यु।
कुछ इस तरह जैसे नदी समुद्र में खो जाए,
पानी में पानी मिला, पानी मिटा-पानी रहा!
लेकिन, मन की गुफाओं में तो,
तू भय बनकर घूमती है,
"थैनेटोफोबिया" का छद्म नाम,
जो सभ्यताओं में स्थापित करता है,
समाधि, कब्रें, प्रेम का इतिहास, नफरत का भी...
कुल मिलाकर तू ही तो जीवन को गहराई देती है।
और कहीं पन्नों में फड़फड़ाती, कविता कहती है,
तू रात का अंतिम पंख है,
जो सूरज को जन्म देता है।
तू वो नींद है, जिसमें सपने नहीं होते।
अनंत को गिनते हुए, तू वह आईना है,
जिसमें जीवन अपना अर्थ ढूँढता है, अर्थ खोते हुए।
अरे! लेकिन, इन सबसे दूर, तू चुपचाप क्यों खड़ी है,
न तो शत्रु तेरा, न कोई मित्र,
तू इतना बड़ा सच है, जो अटल है, है अपरिहार्य।
हर सेकंड कितनी ही जानें ले लेती है तू।
मेरे अंदर भी कितनी कोशिकाएं, कितने जीवाणु, तुझसे मिलते रहते हैं।
और, सच बता,
कहीं तू ब्रह्मांड का वह गीत तो नहीं,
जिसके बोल अभी अधूरे जाने हैं...
या शायद समझा गया है, केवल एक ही शब्द तेरा।
