तू और मैं - ४
तू और मैं - ४
मैं हर रात प्रेम की तलाश में
भटकने वाला एक मुसाफ़िर,
ओस के बूंद जैसा।
तू हर सुबह की
सूरज की पहली
कोमल किरणों जैसी।
तू हँस हँस कर
जब बिखरने लग जाती
मैं तेरी उन सुनहरी मुस्कानों पे
मरने को मजबूर हो जाता।
तेरी प्यार की मजबूरी
मुझे मजबूत कर जाती
और . . .
मैं तोड़ जाता
वो बंधन
जिससे बांध कर
इन बागी लताओं ने
पिछली रात के
अंतिम प्रहर पे
मुझे अपनी हिरासत में
ले रखा था।

