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Alka Nigam

Tragedy

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Alka Nigam

Tragedy

तुम्हारे सहारे

तुम्हारे सहारे

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एक तुम ही तो थे

जिसके सहारे,

चल पड़ी थी मैं।

खुद को लता बना,

तुम से लिपट गयी थी मैं।

अपनी ही जड़ों से उखड़ के,

तुमको छांव देने चल पड़ी थी मैं।

भरोसा था तुमपे के सींचोगे तुम, 

जड़ों को इसकी,

बारिश से अपने प्यार की।

दोगे खाद पानी,

मान और सम्मान का,

पर.......

तुम तो खड़े रह गए, 

दर्शक से बने कोने में।

जड़ों मेरी मट्ठा,

सब डालते चले गए।

यूँ तो.......

कहने को तुम साथ थे,

पर रात में ही पास थे।

दिन के उजाले में,

तुम भी लगते अनजान थे।

तानों को सुन सुन ज़हन में,

शूल से उगते गए।

धागे बंधन के,

ख़ुद ही खुलते गए।

बीतते हर पल के साथ,

पाषाण सी होती गई।

बेल थी मैं मोगरे की,

नागफनी बन गई।

आज जो कहते हो इतना, 

विष कहाँ से भर लायी।

पाया जो तुमसे वही तो,

थाली में परोस लायी।



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