तुम ही हो
तुम ही हो
जिधर देखती हूं उधर तुम ही हो
फूलो की रंगत में
चिड़ियों की चहचहाहट में
भौंरों की गुनगुन में
तड़ित की चम-चम में
सबके प्राणों में बसी
धड़कन की सरगम हो
जलधि की लहरों में
लताओं के पातों में
हर एक के गीतों में
बसे सृजन तुम ही हो
वेदों की ध्वनि में
पक्षी के कलरव में
मयूर के नर्तन में
वीणा की मधुर धुन हो
थकित की आस
जीवन का विश्वास हो
तृषित की एक प्यास हो
गगन में, अनल में, पवन में
भास्कर का सिंदूरी कुमकुम हो
मृदु झोंकों में तुम ही हो
साधना हो आराधना हो,
चेतन हो, लय हो, मुखर हो
जिधर देखती हूं उधर तुम ही हो।
