STORYMIRROR

Dr. Vijay Laxmi"अनाम अपराजिता "

Abstract

4  

Dr. Vijay Laxmi"अनाम अपराजिता "

Abstract

तुम ही हो

तुम ही हो

1 min
282

जिधर देखती हूं उधर तुम ही हो

फूलो की रंगत में 

चिड़ियों की चहचहाहट में

भौंरों की गुनगुन में 

तड़ित की चम-चम में 

सबके प्राणों में बसी

धड़कन की सरगम हो 


जलधि की लहरों में 

लताओं के पातों में 

हर एक के गीतों में

बसे सृजन तुम ही हो 

वेदों की ध्वनि में

पक्षी के कलरव में 

मयूर के नर्तन में

वीणा की मधुर धुन हो


थकित की आस

जीवन का विश्वास हो

तृषित की एक प्यास हो

गगन में, अनल में, पवन में

भास्कर का सिंदूरी कुमकुम हो 

मृदु झोंकों में तुम ही हो

साधना हो आराधना हो,

चेतन हो, लय हो, मुखर हो

जिधर देखती हूं उधर तुम ही हो

    



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract