टूटे मकान से निकला
टूटे मकान से निकला
टूटे हुए मकान से निकला,महल छोड़ कर
बहती हुई नदी से निकला,प्यास छोड़कर
परिंदा हूं,मे तो साखी उन्मुक्त गगन का,
आसमाँ से निकला हूं,आशियाँ छोड़कर
अजीज दोस्त से बिछड़ा,कदम छोड़कर
टूटे हुए मकान से निकला,महल छोड़कर
गलतफहमियां के गलत विचार है,उ
से,दिखावे बू से निकला,दलदल छोड़कर
आज उनको बड़ा ही बुरा लगता साखी,
गर्व तोड़कर निकला,स्वाभिमान ओढ़कर
पतंग नही टूट जाऊं,खुद ही आसमाँ हूं,
में शीशे से निकला,पर परछाई छोड़कर
वो एकदिन समझेंगे,जब ठोकर खाएंगे,
अभी उड़ रहे हवा में,हकीकत छोड़कर
में कोई फूल-वूल नही शूल हूं,गुलाब का
हमे छोड़ निकले,सच्चाई से मुंह मोड़कर
हारेगा दिखावा,जीतेगा दोस्ती का धागा,
जब आएंगे मेरे पास,झूठा जग छोड़कर!
