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बेज़ुबानशायर 143

Tragedy Inspirational

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बेज़ुबानशायर 143

Tragedy Inspirational

'' तपती धरती ''

'' तपती धरती ''

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चलते गरम थपेड़े लू के

झुलसा रही शरीर को 

विकल हो रही मानवजाति

तरसती पानी की बूँद को 


हवाओं में भी तपन है

आसमान से आग बरस रहा 

तवे समान जलती है धरती

कोई किनारा न दिख रहा 


सूरज की गर्मी के कारण

शीतल जल भी तप्त हो रहा

कहाँ जायें,क्या करें

इंसान विकल हो पूछ रहा 


अभी तो यह हाल है

आगे जाने क्या होगा 

जब तापमान धरती का बढ़ जायेगा

यह मानवजाति विकल हो पछतायेगी 


लेकिन पछताने से क्या होगा

हमें वृक्ष लगाना होगा 

हमारी पीढ़ी तो भुगत रही

अगली पीढ़ी को बचाना होगा।


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