STORYMIRROR

V. Aaradhyaa

Abstract Tragedy Thriller

4  

V. Aaradhyaa

Abstract Tragedy Thriller

तप रहे हैं संबंध

तप रहे हैं संबंध

1 min
317

नींद खुल जाती है सुबह सकारे,

तप रहे हैं आज कल संबंध सारे,

लुप्त धीरज मंद रिश्तों के ये धारे।


क्षुब्ध होकर तोड़ना अच्छा नहीं है,

खुद समझ तू उम्र में बच्चा नहीं है,

उठ बचा ले टूटते अनुबंध सारे।


हम बहुत कुछ जान कर अनजान होते,

मौन  होकर  रिक्तता  को रोज ढोते,

लग ही जाते अंततः अपने  किनारे।


छल रही है हीनता संवाद में अब,

घुट रही है जिंदगी प्रतिवाद में अब,

खत्म कर और बैठ अपनों सँग कुछ पल।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract