" तेरे मेरे ..दरमियाँ "
" तेरे मेरे ..दरमियाँ "
जबतल्क जिस्म का ज़रूरत था तुझे,
तब तल्क तू लूटता रहा मेरी जवानियाँ।
क़िस्मत ने भी क्या खूब खेल दिखाई,
अब कुछ बचा नहीं तेरे मेरे दरमियाँ।।
जब तल्क खूबशूरत कली थी मैं,
तबतल्क रोज लेती थी बागों में अंगड़ाइयां।
मग़र माजरा कुछ अजीब था,
रोज मंडराते थे भौंरे बनकर मेरी परछाइयाँ।।
मैं बिखरती गई डालियों से, जब तल्क
पालती रही मन में गलतफहमियां।
वक़्त का हिसाब कुछ अजीब था,
उधेड़ - बुन में फस गई थी मेरी कश्तियाँ।।
भौंरों के बीच बन गई मैं मज़ाक फिर भी
ढूंढती रही ख़ुद में कमजोड़ियाँ।
हर कोई पलट गया कहकर यह कि
तेरे घर दस्तक दी है वीरानियाँ।।
Dr Gopal Sahu
