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डॉ. प्रदीप कुमार

Inspirational

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डॉ. प्रदीप कुमार

Inspirational

स्वछंदता

स्वछंदता

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इंसान स्वतंत्र क्यों होना चाहता है?

क्यों वो खुले आकाश में उड़ना चाहता है?

क्यों है चाहत उसे हर बंधन से मुक्त होने की?

क्यों वो अकेले सारा सुख-दुःख भोगना चाहता है?

जबकि ये धरती जिसपे वो रहता है, बंधी है सूर्य से,

जिस चांद को देखकर वो हसीन सपने देखता है, 

बंधा हुआ है वो भी पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से, 

फिर वह स्वयं को श्रेष्ठ क्यों समझता है?

इतनी अकड़ आख़िर किस बात की रखता है?

घर-परिवार, दोस्त-यार, 

क्यों लगने लगते उसको बेकार?

क्या ज्ञान प्राप्ति का यह एक स्याह पहलू है?

कि सबसे नाता तोड़ के, लोगों से मुख मोड़ के, 

ध्यान लगा के बैठे रहना, या हिमालय पर तप करना?

अपना कर्तव्य भूलकर, अकर्मठ बने रहना, 

मनुष्य रूप में पैदा होकर, उसी की बुराई करना।

क्यों घृणा है तुम्हें उन बंधनों से? 

जिससे तुम हो बंधे हुए, 

क्यों तुम पागल होना चाहते हो?

लक्ष्मण-रेखा लांघना चाहते हो।

कर्म करना भी एक तप है, 

निष्क्रिय रहना पाप है, 

जिसे तुम मोक्ष समझ रहे, 

वो तुम्हारे लिए अभिशाप है।

अपनी जड़ से जुड़े रहो, 

किसी बहकावे में मत बहो, 

जिन बंधनों ने जकड़ा है तुमको, 

उन्हें अपना समझकर खुश रहो।


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