स्वार्थ
स्वार्थ
कभी स्वार्थ को
स्वभाव में देखिये
ये सुंदर संसार की
रचना का आधार भी हो सकता है।
एक स्वार्थ हम तक सीमित है
एक हमारे परिवार तक
एक हमारे गांव तक
एक हमारे देश तक
एक पूरी दुनिया तक
हम ऐसे थे कि
हमारे स्वार्थ में
दुनिया का हित
सन्निहित था।
अपना सब कुछ छूट जाता था
लेकिन सुंदर दुनिया निर्मित
हो जाती थी
आज भी ये मुमकिन है
हम दुनिया को सुंदर
बनाने के लिये
स्वार्थमय हो सकते हैं
अपना सब कुछ
तिरोहित कर
और सुंदर हो सकते हैं।
ये स्वार्थ का अपना स्वभाव है
और हमारी सभ्यता का आधार भी।
