सुनो प्रिय
सुनो प्रिय
मत आना तुम मुझसे मिलने,
ठीक नहीं है मौसम,
मेरे शहर का,
यहाँ शहर की नालियों में,
लाशें ही लाशें हैं,
सड़कों पर धर्म और राजनीति के,
साँप फुफकार रहें हैं,
यहाँ की गलियों में,
खूनी फब्बारों का,
आनंद लेने आती हैं,
प्रशासनिक गाड़ियाँ हर शाम,
इंसान अब यहाँ इंसान नहीं है,
बल्कि हिन्दू और मुसलमान है ।
यहाँ आदमी बम है,
आदमी पिस्तौल है,
आदमी आतंक है,
आदमी गुलाम है,
आदमी ही सामंत है,
नुक्कड़ और चौराहों पर,
धर्मांतरन की मुहिम तेज है ।
मत आना प्रिय तुम मुझसे मिलने,
यहाँ की हवाएँ,
तुम्हें साँस नहीं लेने देंगी,
श्मशानी सड़कों पर,
तुम्हारे कदम नहीं बढ़ेंगे,
तुम्हारे ही शक्ल के लोग,
हिन्दू या मुसलमान करार दे,
तुम्हें मार डालेंगे ।
मेरी आखिरी इच्छा है,
मैं रहूँ ना रहूँ,
मत आना तुम मुझसे मिलने,
मेरे शहर !
