सर्दी जागती हुई
सर्दी जागती हुई
आज सुबह,
तड़के उठा,
शरीर कांपा,
झूरझुरी आ गई,
झट से,
चादर लपेटी,
मोजे पहने,
टोपी लगाई,
चाए के,
दो घुंट पीए,
फिर थोड़ा,
चैन मिला।
जब उपर,
आकाश की तरफ देखा,
बादलों से घिरा,
न मालूम,
कब बरस पड़ेगा।
रजाई में घुस गया,
गर्म पानी की,
बोतल ली,
कुछ समय पश्चात,
निग पड़ गया।
उन लोगों की तरफ,
ध्यान गया,
जो इतनी सर्दी में,
बाहर काम करते,
सीधे ठंड से जूझते,
वो अलग तरह के,
इंसान लगते।
काश! कुछ,
ऐसा कर दिया जाए,
सर्दी वाले दिन,
सब आनलाइन हो जाए,
जिससे सब,
कठोर ठंड से बचें,
अपने अपने,
पत्नी और बच्चों,
संग रहें।
