सपनों का बाज़ार
सपनों का बाज़ार
भरी दुपहरी में नज़र घुमाई,
तो पाया सब अपने थे,
न कोई रिश्ता था न बंधन,
पर सबकी आँखों में सपने थे।
रंग बिरंगे सपनों का,
वह भरा हुआ बाज़ार था।
एक और बार नज़र घुमायी,
तो बस सपनों का व्यापार था।
परदेशी व्यवसायी,
यहाँ जम के शोर मचाते हैं।
क्रीम ले लो, शिक्षा ले लो, डियो ले लो,
के ज़ोर से नारे लगाते हैं।
हर वस्तू को यहाँ,
सपनों-सा दिखाया जाता है।
उन सुनी पढ़ी गयी आँखों में,
नया दीप जलाया जाता है।
गरीब बाप की आँखों में भी,
एक सपना नज़र-सा आता है।
बाज़ार में छात्रवृत खोज,
वह अपनी बिटिया को पढ़ाना चाहता है।
मोहल्ले के हीरो भी,
मोटरसाइकिल दौड़ाते हुए आये हैं।
अपनी-अपनी प्रेम की लालसा को,
सपनों-सी महकाने आये हैं।
आस-पड़ोस की महिलाएँ भी,
आँखों में सपना लायी है।
भरी दुपहरी में अाखिर,
गोरेपन की क्रीम लेने जो आई है।
मैं भी आया हूँ,
इस सपनों के बाज़ार में।
सपनों की तलाश कर रहा हूँ,
इंसानों के आकार में।
सपनों के इस बाज़ार में,
सबने पैसे खूब लुटाए हैं।
आधुनिक सपनों ने,
इंसानों के रोबोट जो बनाये हैं।
भरी दुपहरी में नज़र घुमायी,
तो पाया सब अपने थे।
टूटे फूटे, छोटे बारीक, पत्थर के,
सब बिखरे हुए सपने थे।
