सपने चित्र के
सपने चित्र के
प्रभु हम सबकी तुमसे यह फरियाद,प्रेम का मिले अनवरत स्वाद।
देखते चित्र यथार्थ या कल्पना में, परिजन-स्वजन आ जाते याद।
लम्बे समय के बाद मिल गए, मेरे अपने प्यारे बचपन के एक मित्र।
इच्छा और आग्रह से बंधकर उनके घर, जाकर देखा वहॉ॑ एक चित्र
छलक भावना गयीं अश्कों में, देख पुरानी प्यारी सुन्दर सी तस्वीर।
नाना-नानी याद आ गए,पास मेरे सब कुछ उनका ही केवल नहीं शरीर।
भौतिक - नैतिक - सामाजिक धन, ये सब कुछ उनका ही दिया हुआ।
पाला-पोसा चलना सिखलाया , और जीवन जीने का मुझे ज्ञान दिया।
सदा मेरा जीवन सुखमय बीते ,इस हित निज जीवन कर होम दिया।
अगणित कष्ट सहे बूढ़ेपन के, मुझे बचा तपिश से शीतल छाॅ॑व किया।
बचपन और किशोर उम्र बीती नासमझी में,नशा वक्त का था ना भान हुआ।
आई समझ होश जब आया तब तक , उनकी पारी का तो अवसान हुआ।
जाने -अनजाने कितने ही सारे, अपने स्वप्न अधूरे वे संग लेकर के चले गए।
कुछ न कर सका मैं इतना अभागा,जिए जा रहा उनके सपनों का बोझ लिए।
हे प्रभु क्या मैं कुछ कर पाऊॅ॑गा ? उन आँखों के अतृप्त सपनों की खातिर।
सार्थक कदम भी उठा पाऊॅ॑गा मैं , या फिर रह जाऊॅ॑गा मैं वही पुराना शातिर।
पूर्ण कर सकूॅ॑ प्रभु वे सब सपने, आप मुझे कृपा करके वह शक्ति दे देना।
पूरे जब तक कर न पाऊॅ॑ देना पुनर्जन्म ,प्रभु न मुझे मोक्ष न मुक्ति देना।
