संवेदना _प्रकट
संवेदना _प्रकट
आज व्यक्ति और समाज
दु:ख के घनघोर अंधेरों में है।
कहीं दु:ष्कर्म है
तो कहीं लूटपाट है।
कहीं हिंसा है
तो कहीं मान _अपमान है।
कहीं जात _ पात की लड़ाई
तो कहीं भेदभाव की लड़ाई है।
और यह समाज में,
सर्वथा निंदनीय है।
आखिर वजह क्या है ?
सोचना और समझना पड़ेगा।
एक तरफ समाज है,
एक तरफ सरकार है।
12 घंटा दिन है
तो 12 घंटा रात है।
कहीं भूख है
तो कहीं प्यास है।
कहीं बहुत ज्यादा है,
कहीं बहुत कम है।
लगता है अभी भि,
हमलोग दिल से ,
एक _ दूसरे से दूर हैं।
ऊपर से करोना वायरस
का प्रहार है।
तो जरूरत है ,
समस्याओं के जड़ में जाने का।
भावनाओं को समझना
और समझाने का काम करना है।
कुछ हम सम्हले_कुछ तुम सम्हलो,
मैं तुम्हें अपनी बात बताऊं,
तुम मुझे अपनी बात बताओ।
हम जनता हैं,
जनता से सरकार है।
सरकार जनता के
कल्याणार्थ है।
जनता भी उन्हें,
आंखों का तारा समझते हैं।
शाषण, प्रशासन के हाथों में है।
शाषण प्रणाली तुम्हारी अगर,
नहीं है बेहतर
तो करो इसे और
बेहतर और बेहतरीन।
आप चौकीदार हो,
हम आपके भरोसे हैं।
हमारी रक्षा करना ही
आपका लक्ष्य है।
बड़े ही उत्साहित होकर,
हम लेते हैं उस ,
महामतदान पर्व में हिस्सा
और आपको अपना बेशकिमती
वोट दान देकर जिताते हैं।
जब हमलोग अपने कर्म से पीछे नहीं हटा
तो आप कैसे अपने कर्म से पीछे हट सकते हो ?
मत करो अन्याय,
अपने कर्म_फर्ज_धर्म से।
करो वफादारी अपने कामों से,
एक सभ्य और सुन्दर ,
समाज का निर्माण होने दो।
एक सुखी और सुखद,
भविष्य का निर्माण होने दो।
प्रगति और विकास का,
अद्वितीय दुनिया सजने दो।
आओ मिलकर ये वादा करें।
अपराध और अपराधी का
समूल नष्ट करूं।
आओ मानव बनें,
मानव हूं,
एक _ दूसरे का रक्षा करूं।
मनुष्य ज्ञान के तंतु के सहारे,
हम ज्ञान और कर्म से
प्रकाशमान मार्ग की और
बढूं और मनुष्य बनूं।
