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Anjana Singh (Anju)

Abstract

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Anjana Singh (Anju)

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स्मृतियाॅं

स्मृतियाॅं

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स्मृतियों के धरातल पर

कभी उथल-पुथल सी होती है

कभी दूर तक भागती है

कभी हताश लौट आती है


कभी समुद्र की लहरों सी

दूर तक उफनती है

फिर पुनः वेग से लौटकर

फिर यूं ही थम जाती है


मन के एक कोने में

छुपी रहती हैं स्मृतियाॅं

कभी चुपके हवा बन आती है

फिर पुनः उड़ सी जाती है

 

पल-पल में जिंदगी 

यूं गुजर जाती है

पुनः एक पल में

गुजरी हुई जिंदगी

वापस लौट आती है


कभी दुख के पल को उभारकर

कभी सुख के पल को सहलाकर

रंग बदल कर आ जाती है

फिर चुपके से कहीं छुप जाती है


वक्त के साथ तो सारी

स्मृतियाॅं बह जाती हैं

फिर भी कुछ ना कुछ

मन में सदैव ही रह जाती है


वक्त के साथ 

हर दौर बीत जाता है

पर ये मन स्मृतियों को

विस्मृत नहीं कर पाता है


स्मृति अपने पन्नों में

सब कुछ संभाल रख लेती है

कभी हवा के झोंको सी आती

और मन उड़ा ले जाती है


जब भी मन खाली होता है

बहुत दूर तक सोचती हूं

उन सभी स्मृतियों से

शायद लबालब भरी होती हूं


कुछ दुःख भरी स्मृतियाॅं

मनोभाव में उभरती है

याद बनकर ऑंखों से

अश्रु धारा बन निकलती है


यादों की मीठी लहर

हौले से यूं आती है

संग थे हम कभी

ये स्मृतियां कहलाती है


हल्की-हल्की बारिश की बूँदें

जब तन मन को छूती है

प्रेम रस से भरी स्मृतियां

मानस पटल पर उभर जाती है


बदल जाते हैं कुछ चीजों के मायने

कभी किताबों में बंद मोर पंख

हमारी भोली सी अभिलाषा थी

आज वो शायद स्मृति की निशानी है


कोई हमेशा साथ न देता

कोई हमेशा साथ न रहता

साथ रहतीं हैं स्मृतियाॅं 

ज़िन्दा रहतीं हैं स्मृतियाॅं


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