स्मृति
स्मृति
चारों ओर आँधियाँ चल रही है,
तथा नये अकुरों के कारण प्रसन्न धरती उत्कंठित है
पता नहीं उमड़े हुए,ये बादल अपनी बूदें कहाँ गिरायेंंगे।
मेेरा ये मन कभीकाटा गया, कभी जलाया गया और
कभी स्नेह के शब्दों मेें भिगोया गया, अब मेरा मन सो रहा है।
इसे छुओ मत ये बहुत ज्यादा रोने लगेगा।
मैैं उस पर्वत पर जानाा चाहती हूूँँ
जहाँ प्रेम की लताएं हो मधुरता के सुन्दर फूूूल हो और झीलें हो।
तुम्हारी बातें शुरू होने पर हृदय ने लंबी सांंस ली आँखें रोई शरीर काँँपा
और आश्चर्य की बात तो यह है कि होंंठ हंंसने लगे ।
तुम मेरे अनुकूल होने पर मुुझे समीप लगते हो और प्रतिकूूल होने पर
उससे भी ज्यादा समीप आ जाते हो और यदि एक क्षण के लिए
आप तटस्थ हो जाओ तो और भी अधिक समीपता का अनुभव होने लगता है।
आज कार्तिक अमावस्या की काली रात है धीमी-धीमी
हवा वह रही रात्रि सुन्दर है ,दीपको की लौ जगमग रही है ,
रात्रि की सुंदरता देखने योग्य है ऐसेे में आज आपका स्मरण तो मरण ही हैैं।

