सखी री!निगोड़ा बसंत सताता है
सखी री!निगोड़ा बसंत सताता है
बसंत ऋतु के आते ही ,
मेरा मन चंचल हो जाता है !
अपने प्रिय के आलिंगन को ,
याद कर तन विकल हो जाता है!
बौराई आम की डाली की तरह ,
मेरा अंतस भी झूम झूम जाता है !
प्रेम क्षुधा बढ़ती जाती है ,
उनके दरस को मन बड़ा आकुलता है!
सच कहती हूँ सखी री ,
ये ऋतुराज बसंत बहुत सताता है !

