सिर्फ़ तुम (02)
सिर्फ़ तुम (02)
मेरे जहन में रहते हो तुम
कभी दरिया
तो कभी बयार बनते हो तुम
कभी हंसी
तो कभी मुस्कान बनते हो तुम
कभी दर्दे दिल का ख्वाब बनते हो तुम
हिचकी बन कभी याद बनते हो तुम
कभी आँखों से बह दिल जलाते हो तुम
कभी हिम्मत बन जीतने का पाठ पढ़ाते हो तुम
गिर जाऊँ तो झट से उठाते हो तुम
मैं क्या हूँ ? खबर नहीं तुमको
तुम क्या हो ..मेरे लिए ये जानते हो तुम।
तुम दोस्त हो ....तुम प्यार हो
तुम बदन हो..तुम जान हो
तुम साँस हो...मेरे ख्वाबों की नयी आस हो
कभी दूर चंदा हो तुम
कभी पास मुलाकात हो
कभी प्यास हो खुद की
कभी मेरे अधरों की प्यास हो
कभी शाम हो तो
कभी दिन तो कभी रात हो
कभी बात हो कभी जज्बात हो
कभी धड़कनों का राज हो
तो कभी मेरी हमराज हो
मेरी पहचान बन मेरे अंदर रहते हो तुम
मेरी हक़ीक़त मेरी जान हो तुम।

