STORYMIRROR

Deepak Sharma

Abstract

4  

Deepak Sharma

Abstract

सिक्का उछाल देता है

सिक्का उछाल देता है

1 min
350

वफ़ा के नाम पे मुश्किल में डाल देता है।

वो बात बात पे सिक्का उछाल देता है।।


समझ रहे है यहाँ लोग सब मुझे पागल।

जिसे भी देखिये पत्थर उछाल देता है।।


बता के क़िस्से मेरे खुद वो बेवफ़ाओं को।

मेरा नहीं है पर मेरी मिसाल देता है।।


बना के  रूप नये  रोज़ रोज़ वो दिलबर।

मेरे  शे‘रों को  हसीं से  ख़याल देता है।।


मुझे  यूँ  देखके अक्सर उदास, नींदों में।

तमाम  ख़्वाब  वो  तेरे  ही डाल देता है।।


करे है जब भी परिशां तसव्वुर मेरा।

तो ठहरे पानी में वो कंकर उछाल देता है।।


रहे हैं कुछ तो मरासिम ज़रूर ‘दीपक’ से।

सुकून मुझको जो उसका विसाल देता है।।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract