STORYMIRROR

Deepak Sharma

Abstract

4  

Deepak Sharma

Abstract

क्या... अब वतन आज़ाद है ...?

क्या... अब वतन आज़ाद है ...?

1 min
36

सच कहो क्या सच में अपना अब वतन आज़ाद है। 

हर गली हर कोना क्या सारा चमन आज़ाद है। 

बेटियाँ माँयें यहाँ क्या हर बहन आज़ाद है। 

क्या हमारी भारती माँ का बदन आज़ाद है। 


दूध की नदियाँ कहाँ हैं खून बहता है यहाँ। 

अब कहाँ सोना उगलती है धरा पावन बता। 

क्यूँ हिमालय है सिसकता गंगा क्यूँ रोती रहे। 

मंदिरो-मस्जिद में बोलो क्या नमन आज़ाद है। 

सच कहो क्या सच में अपना अब वतन आज़ाद है


नोचते हैं देश को और शर्म भी करते नहीं। 

हम पड़ोसी के ग़मों पर आह क्यूँ भरते नहीं। 

बो रहे हैं नफ़रतें हम खेत और खलिहान में। 

राम और रहमान की धरती का धन आज़ाद है। 

सच कहो क्या सच में अपना अब वतन आज़ाद है


भाईचारा यूँ दिखे आपस में मिलकर हम रहें। 

तू अगर रोए तो मेरी आँख से आँसू गिरें। 

हर बहन, बेटी की इज़्ज़त हो हमारे देश में। 

हो ख़ुशी हर रंग को हर फूल को ख़ुश्बू मिले। 

फिर कहेंगे शान से अपना वतन आज़ाद है। 


अब भी जागो और वतन पे मर मिटो ए दोस्तों। 

नफ़रतों के ज़ोर को अब कम करो ए दोस्तों। 

ये शपथ लेते हैं हम के अब न धोखा खायेंगे। 

देश के दुश्मन को मिलके हम सबक़ सिखलाएँगे। 

फिर कहेंगे शान से अपना वतन आज़ाद है।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract