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Amit Kumar

Abstract Classics Inspirational

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Amit Kumar

Abstract Classics Inspirational

सहयोग

सहयोग

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सहयोग एक कला है

जो हमें सीखनी होगी

इसकी अहमियत और

जिम्मेदारी हम सबको

निजीतौर पर समझनी होगी


कौन जिम्मेदार है

इस भारी मनुष्यता के

क्षीण-क्षीण होने का

क्या कमाया है हमने

मानवता को खोकर

अपने ज़मीर को बेचकर

चन्द काग़ज़ी टुकड़े

जो खाना तो ला सकते हैं


लेकिन उसे पैदा नही कर सकते

जो महलों-ईमारतों का निर्माण

तो कर सकते है लेकिन

उनकी बुनियाद नही रख सकते

जो खेतों के लिये

ज़मीन तो खरीद सकते हैं


लेकिन उस पर हल नही चला सकते

ऐसे बहुत सी आदि अनादि 

ज़रूरतों को पूरा करने में

माना यह काग़ज़ी टुकड़े 

बड़ी अहमियत रखते है

लेकिन यह कुछ भी हो सकते हैं

सब कुछ नहीं सकते


क़ुदरत नहीं हो सकते

इंसान नहीं हो सकते

अभिमान तो हो सकते हैं

लेकिन किसी का सम्मान नहीं हो सकते

स्वाभिमान होने के लिए

ज़मीर रूपी रीढ़ को मजबूत 

और सबल होना ज़रूरी है


यह अमीर जो खुद को

भगवान समझते हैं

भूल जाते है भगवान के रूप

स्वरूप को नकारने वाला

शैतान तो हो सकता है लेकिन.....

आप खुद समझदार है


मैं मानता हूं यह पैसा भगवान नहीं है

लेकिन भगवान से कम भी नहीं है

क्योंकि भगवान के अस्तित्व को

हमारी ज़रूरतों ने जन्म दिया है

हर कमी हर डर के पीछे

एक नया भगवान है 


मज़दूर के लिये दो जून की 

रोटी उसका भगवान है

गरीब के लिए समाज भगवान है

अमीर के लिये उसका गुरुर भगवान है

नीच के लिये उसकी खोखली

ज़िद उसका भगवान है

जैसी ज़रूरत है वैसा ही भगवान है

कोई आहत न होना

मेरी बातों से यारों

यह मैं नही कहता हूं


आप सब यही कहते है

लेकिन अपने अंतर्मन से

अपने आप से

काश! यह हमने एक -

दूसरे से कहा होता

मिलजुलकर जो हो सकता है

उसे सहयोग कहते है


एक - दूसरे से जो होता है

उसे संघर्ष कहते है

बड़ी विडंबना है हमारी भी 

हम संघर्ष तो कर सकते है 

लेकिन सहयोग नही करते

इसी कारण से कुछ गधे है


जो हमें इंसान नहीं समझते

उनकी समझ बिल्कुल सही है

क्योंकि इंसान का वज़ूद सिर्फ़

इंसान समझते हैं।


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