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Bhavna Thaker

Romance

4  

Bhavna Thaker

Romance

शृंगार रस

शृंगार रस

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मैं आम सी अर्धांगनी खास हो जाती हूँ जब तुम्हारा निर्लज चुंबकीय स्पर्श

मेरे एहसासों को उन्मुक्त करते लिपट जाता है..

 

सुनो ज़रा हौले से छूना मेरे गुलाबी गालों के भीतर खून उबल जाता है.. 

बस मेरी बंद पलकों पर एक मोहर लगा दो अपनी चाहत की, 

उफ्फ़ कितनी धनवान हो जाती हूँ तुम्हारी प्रीत का कोष पाकर..


घुल रही है मेरी साँसों में तुम्हारे स्पर्श की उष्मा मैं पिघल रही हूँ, 

हर इन्द्रियां मेरी मुझसे नाता तोड़ते तुम्हारे रचे प्रेमिल ब्रह्माण्ड में प्रवेश कर रही है..


मैं नखशिख अपने आराध्य को समर्पित होते घूँट घूँट इश्क का दरिया पी रही हूँ, क्या जादू है तुम्हारे अभिमर्ष में 

तिल-तिल टूटकर तुम्हारे आगोश को अपने तन का आशियां बनाते गुम हो जाती हूँ.. 


तुम्हारी ऊँगलियों की कशिश हर बार भ्रमित करते मेरे ठंडे एहसासों पर उन्माद का मरहम लगाती है, 

तुम्हारी नज़दीकियां पाते ही अपने आप में सिमटी मैं मुखर हो जाती हूं।


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