श्रीमद्भागवत-२१५; प्रलम्बासुर उद्धार
श्रीमद्भागवत-२१५; प्रलम्बासुर उद्धार
श्री शुकदेव जी कहते हैं, परीक्षित
राम और श्याम योग माया से
ग्वाल बालों का वेष बनाकर
व्रज में थे क्रीड़ा कर रहे।
उन दिनों ग्रीष्म ऋतु थी
परन्तु वृन्दावन अपने गुणों से
बसंत की छटा बिखेर रहा था
ठंडी फुहारें आ रहीं झरनों से।
देखते ही बनती हरियाली वृक्षों की
पृथ्वी हरी हो रही घास से
नदियों में जल भरा हुआ था
कमल खिल रहे भांति भांति के।
वन में वृक्ष फूलों से लदे हुए
पक्षी उनपर चहक रहे थे
मोर कूंज रहे कहीं पर
गुंजार कर रहे कहीं भौरें।
इस प्रकार बलराम और कृष्ण
लीला कर रहे थे वन में
गवाल बालों के संग में दोनों
तरह तरह के खेल खेलते।
गोयें चरा रहे एक दिन वो वन में
तब वहां ग्वाल के वेष में
एक असुर प्रलम्ब नाम का
घुस आया उन ग्वालवालों में।
कृष्ण, बलराम को हरने आया वो
भगवान देखते ही पहचान गए
वध करने का निश्चय किया उसका
भगवान ने तब किसी युक्ति से।
ग्वाल बालों को दो दलों में बांटा
कुछ कृष्ण के साथी बन गए
कुछ बन गए साथी बलराम के
प्रलम्बासुर था कृष्ण के दल में।
एक दल दूसरे दल को
चढ़ाकर पीठ पर ले जाता था
जीतने वाला दल चढ़ता था
हारने वाला दल ढोता था।
एक बार बलराम के दल के
श्री दामा, वृषभ ने बाजी मार ली
कृष्ण आदि ढोने लगे उनको
कृष्ण की पीठ पर श्री दामा जी।
भद्रसेन ने वृषभ को ढोया
बलराम जी को प्रलम्बासुर ने
बलराम जी जब थे उसकी पीठ पर
फूर्ति से वो ले भगा उन्हें।
पर्वत के समान बलराम जी
दूर तक ना ले जा सका उन्हें
बोझ के कारण चाल रुक गयी
दैत्य रूप तब धारण किया उसने।
आँखें आग के समान थीं उसकी
दाढ़ें भी बड़ी भयंकर थीं
आकाश में जब उन्हें ले जाने लगा
घूँसा मारा उसके सिर पर तभी।
उसका सिर चूर चूर हो गया
आग उगलने लगा वो मुँह से
प्राणहीन हो पृथ्वी पर गिर पड़ा
ग्वाल बाल सब आनंदित हुए।
प्रलम्बासुर मूर्तिमान पाप था
सुखी हुए देवता उसकी मृत्यु से
बलराम जी को प्रसन्न करने को
पुष्प वर्षा उनपर करने लगे।
