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Manju Saini

Inspirational

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Manju Saini

Inspirational

शीर्षक: कंकाल सी स्मृतियां

शीर्षक: कंकाल सी स्मृतियां

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यादें बीते समय की मानो कंकाल रूप में हो

लगता हैं शायद मांस उतार दिया गया हो यादों का

रह गया हैं यादों का कंकाल मात्र साथ चलने को

स्मृतियों को मानो देह रूपी कंकाल नहीं मिल रहा है

वैसे ही है कंकाल सी स्मृतियां


यादें आती जाती रेल गाड़ी सी हो चली हैं

यादों से स्टेशन से रह गए है देह में भीतर तक

मानो बादल बरसेंगे फिर छिप जायेंगे यादों के

रेत पर बूंदें जैसे अपने निशान छोड़ जाती हैं

वैसे ही है कंकाल सी स्मृतियां


शुष्क मिट्टी में मानो बूंदों ने छिड़काव किया नेह का

बंजर भूमि भी हरियाली फूटने को लालायित होती हैं

वैसे ही यादों की बारात सी निकलती है स्मृतियों में

बस यादों की लहरों में हिचकोले खाते हुए हम

वैसे ही है कंकाल सी स्मृतियां


यादों में बहे आंसू करेंगे खाद का काम और

यादों की फसल लहलहाने को तैयार मानो मिला हो

उपजने को मिली हो खदिली भूमि बीज को तैयार

आंखों से यादों के आंसू बह चलते हैं यकायक ही

वैसे ही है कंकाल सी स्मृतियां



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