शब्दों में रोता कवि
शब्दों में रोता कवि
शब्दों से लोगों की पीड़ा कहता है,
वो खुद भीतर ही बादल सा बहता है।
जैसे सावन हर खेत भिगो दे,
पर खुद बिजली की पीड़ा सहता है।
वो पवन की तरह सबको छू लेता है,
पर लौटकर फिर अकेला रह जाता है।
हर वृक्ष को छाँव दे जी भर के,
पर खुद धूप में तपता जाता है।
कभी झरनों सी मीठी वाणी,
तो कभी पर्वत-सी मौन कहानी।
सबके दिल को हरियाली दे,
पर खुद बंजर मन में छाया पानी।
चाँदनी बनकर रात सजाए,
पर चाँद की तन्हाई कौन समझाए?
वो जो फूलों से जीवन रंगे,
अपने काँटों को कौन दिखाए?
कवि, एक ऋतु है अनकही-सी,
जो खुद को हर मौसम में खोता है।
शब्दों से जो जीवन देता है,
प्रकृति की तरह ही — भीतर रोता है।
