शब्द और प्रेम
शब्द और प्रेम
शब्द मेरे अब तुझे कोई वेदना ना दे,
इसलिए अब मैं खामोश रहता हूँ,
प्यार मेरा अब और तुझ पर बोझ ना हो,
इसलिए अब मैं ख़ुद को दूर रखता हूँ ।
शब्दों के तने पर प्रेम का फूल नहीं खिलता,
वहाँ सिर्फ़ ठुंठ मिलता है,
शब्दों के तने पर स्नेह का फल नहीं फलता,
वहाँ सिर्फ़ दीमक मिलता है,
शब्दों के तने पर मोहब्बत का मंज़र नहीं आता,
वहाँ सिर्फ़ आकाल मिलता है ।
प्रेम चेतनाओं में पलता है,
और भावनाओं में आराम करता है।।
शब्द हैं बंधन सरीखे,
प्रेम तो उन्मुक्त बहता है ।।
शब्द अगर जो ब्रह्म होते,
ये विश्व रच देते,
शब्द अगर जो अमर होते,
हर जान बख़्स देते,
पर मेरी मानो तो शब्द अस्त्र हैं,
अब तो ये सत्ता पलट देते।।।
सच कितना ग़लत था मैं,
शब्दों से प्रेम की आस रखे था ।
जिस रोज़ मैं प्रेम को शब्दों के जाल से छुड़ा लुंगा,
संभव है उस रोज़ मैं प्रेम को अपना लुंगा ।।

