सब्र
सब्र
सब्र ही तो नहीं रहा है, आजकल लोगों के पास सब्रहीन होकर लोग कुल्हाड़ी मार रहे, स्व पांव
अधीर हो, एकदिन में चाहते, सब सफ़लता आज होता जरा भी सब्र आती, उनको यहां पर लाज
लोभ, लालच के छोड़ देते, वो यहां पर बुरे काज जिनकी रूह तक समाया हुआ है, सब्र लाजवाब
लोभ की वो ही कर सकते है, यहां पर तीन-पांच जिनके हृदय में भरा हुआ है, सब्र का बड़ा बांध
पर अफ़सोस, लोगों ने लोभ को बना रखा, बाप जो समय-समय पर देता, चांद से मन को दाग
मृत्यु बाद भी उनको रहना पड़ेगा धन के पास यह लोभ उनको अगले जन्म में बना देगा, नाग
सब्र तो इस दुनिया में वो मीठा फल है, ख़ास जो अमावस को भी बना देता है, पूनम रात
पर सब्र के लिये भी धैर्य का चाहिए, हथियार धैर्य से खिल जाते है, पत्थर पर भी फूल हजार
सब्र रखिये, सब्र में होता, परमात्मा का वास त्याग दे, लालच सब्र बनायेगा, फ़लक बाज
जो धीरे-धीरे ही सही पर चलते है, लगातार वो एक दिन मंजिल ख्वाब करते है, साकार
जो लोभ, लालच को देते है, जीवन में तलाक वो निर्धन ही सही, खरीद लेते दुनिया के बाग
सब्र, धैर्य की पकड़े जो जग-दरिया में, पतवार वो बड़े से बड़े दरिया को भी कर जाते है, पार
सब्र रख साखी, मुसीबतों के दिन बस है, चारचलता रह नेकी की राह पर, वो खुदा है, उदार
कितना ही घना क्यों न अमावस्या का अंधकारएक सूर्य की किरणें के आगे, वो होता है, लाचार
यूं तो बहुत से मनुष्य बने हुए है, छद्म कलाकार जो बाहर से जिंदा दिखते, भीतर है, मुर्दा संसार
जो लोभ, लालच पर चलाते सब्र, धैर्य की तलवार वो ही हकीकत में निभाते जिंदा होने का किरदार
